अजय पाल योगी का मुसलमान होना

अजमेर में इस्लाम के तेजी से फैलने पर पृथ्वीराज को बहुत चिन्ता हो गयी थी। इसलिए उसने हुजूर गरीब नवाज र.अ. के मुकाबले के लिये अपने खानदानी गुरु की मदद ली, जिसका नाम अजय पाल योगी था। अजय पाल हिन्दुस्तान का सबसे बड़ा और बा कमाल जादूगर था जो अजमेर के पास ही जंगल में रहता था। राजा ने बुलाकर ख़्वाजा साहब का सब हाल उसे सुना दिया। अजय पाल योगी ने हुजूर के उन मामूली कारामात को हाथ की सफाई और नज़रबन्दी समझा। उसने राजा को यकीन दिलाया कि उस फकीर को यहां से निकाल दूंगा। मृग छाल पर बैठा और अपनी सभी शगिर्दों को साथ लेकर आना सागर की तरफ रवाना हुआ जहां सरकार ग़रीब नवाज र.अ. ठहरे हुए थे। शैतानों का यह लश्कर उड़न शेरों पर सवार हाथों में अजगरों के कोड़े लिए हुए जंगलियों की तरह चिल्लाते-चिल्लाते आना सागर के किनारें आ जमा, हुजूर ग़रीब नवाज़ र.अ. के नये मुसलमान शागिर्द उस शैतानी लश्कर को देखकर घबरा गये। उसी वक्त आपने उंगली से लकीर खींच दी और फरमाया-‘इसके बाहर न जाना, महफूज रहोगे।’

अजय पाल और उसके चेलों ने अपने हाथों से जादू के अजगर छोड़ दिये। जो हज़रत की तरफ बड़ी तेजी से लपके, मगर उस लकीर तक आकर सब के सब जल गये। इस तरकीब के नाकाम होने से जादूगरों ने आग बरसाना शुरू किया, मगर उस आग ने भी सरकार ग़रीब नवाज र.अ. और आपके साथियों पर कोई असर नहीं किया बल्कि वह आग वापस लौट गई और उससे जादूगर ही जल कर खाक होने लगे। जब उनका कोई करतब कारगर न हुआ तो अजय पाल ने तय किया कि आसामान पर पहुंचकर वार किया जाये अतः वह आसमान की तरफ उड़ने लगा ताकि हवा में रहकर हमला कर सके। जब हुजूर ग़रीब नवाज़ र.अ. की नजर उस पर पड़ी तो आपने अपनी जूतियों को इशारा किया कि उस बेदीन को नीचे उतार लायें। जूतियां ने उड़ान भरी और आन की आन अजय पाल के सिर पर पहुंचकर तड़ातड़ पड़े लगीं। थोड़ी देर बाद क्या देखते हैं कि जूतियां अजय पाल के सिर पर मुसल्लत (छा गई) हैं और वह लाचार नीचे उतरा चला आ रहा है। आखिर घमंड का सर नीचे हुआ। अजय पाल की आंखों से अब पर्दे उठ चुके थे और उसने समझ लिया था कि जादू बेकार है। आज तक जादू सीखने में जिन्दगी बर्बाद की इसलिये आंखों में आंसू भर लाया और माफी मांगी। ख़्वाजा साहब र.अ. ने दया करके उसे माफ कर दिया और वह सच्चे दिल से मुसलमान होकर आपके चाहने वालों में शामिल हो गया। हुजूर ने उसका इस्लामी नाम अब्दुल्लाह रखा। उसके बाकी चेले भी मुसलमान हो गये और जितने आदमियों ने किनारे पर यह घटना देखी वे सब भी मुसलमान हो गये।

अजय पाल ने ईमान लाने के बाद हुजूर ग़रीब नवाज़ की खि़दमत में इल्तिज़ा की कि हुजूर अपने मदारिजे आला से आगाह फरमायें, आपने मुस्कुराकर फरमाया-‘आंखें बन्द करो।’ आंखें बन्द करते ही उसने देखा कि तमाम हिज़ाबात (पर्दे) उठना शुरू हो गये और आलमे बरज़ख़, आसमान और यहां तक कि अर्शे आज़म तक की सैर करा दी। जब उसकी तबीयत सैर हो गयी तो हुक्म दिया कि आंखें खोलो, आंखें खोलकर हुजूर के कदमों पर गिर पड़ा। हुजूर ने बहुत मुहब्बत से उसे उठाया और इतना ज़्यादा करम फरमाया कि उसे औलिया के दरजे तक पहुंचा दिया। अब उसने एक और इल्तिजा पेश की कि मैं हयाते बदी का तालिब हूं। हुजूर ने बारगाहे खुदावन्दी में अर्ज गुजारी जिस पर शरफे कबूलियत हासिल हो गया। कहा जाता है कि अब्दुल्लाह जिन्दा है और भूले-भटके मुसाफिरों को रास्ता बताते हैं। अजमेर और उसके आस-पास के लोग उन्हें अब्दुल्लाह बियाबानी के नाम से पुकारते हैं।

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