अल्लाह के ध्यान में मग्न

हजरत ख्वाजा गरीब नवाज र.अ. पर अक्सर ऐसा होता था कि अल्लाह तआला की याद में इस तरह मग्न हो जाते कि और कुछ खबर न रहा करती थी। आखिरी वक्त में ध्यान व ज्ञान की कैफियत बेहद बढ़ गयी थी। नमाज के वक्त ख्वाजा कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी र.अ. या ख्वाजा हमीदुद्दीन नागौरी र.अ. सामने खड़े होकर ऊंची आवज में ‘सलात सलात’ (नमाज नमाज) पुकारते, आप फिर भी होश में न आते तो कान में सलात पुकारते। इस पर भी आप न हिलते तो आपका शाना (कन्धा) मुबारक हिलाया जाता, उस वक्त आप आंख खोलकर इर्शाद फरमाते-‘रसूलुल्लाह स.अ.व. की शरीअत से छुटकारा नहीं, सुब्हान अल्लाह कहां से आना पड़ता है।’ और फिर वुजू करके नमाज पढ़ते। जब आप पर यह हालत ज्यादा होती तो हुजरे का दरवाजा अन्दर से बन्द कर लेते और यादे इलाही में मशगूल हो जाते। उस वक्त ख्वाजा कुतुबुद्दीन या ख्वाजा हमीदुद्दीन नागौरी र.अ. हुजरे के दरवाजे पर पत्थर के टुकड़े डाल देते और खुद हुजरे के पीछे चले जाते। जिस वक्त हुजूर बाहर निकलते और आपकी नजरे जलाली उन टुकड़ों पर पड़ती तो वह जल कर खाक हो जाते।

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