चार यार

जामा मस्जिद शाहजहांनी के दक्षिण दीवार के साथ ही एक छोटा सा दरवाजा है, जो पश्चिम की तरफ खुलता है। इस
दरवाजे के बाहर एक बड़ा कब्रिस्तान है। यह कब्रिस्तान झालरा की दीवार से लेकर जामा मस्जिद के पीछे दूर तक फैला हुआ है। इस कब्रिस्तान में बड़े-बड़े आलिमों, फाजिलों, सूफियों, फकीरों और औलिया-अल्लाह के मजारात हैं। मौलाना शम्सुद्दीन साहब र.अ. भी इसी जगह दफन हैं और मौलाना मुहम्मद हुसैन साहब इलाहाबादी र.अ. भी इसी जगह मदफून हैं। जिनका विसाल मज्लिसे सिमआ में हुआ था। कहा जाता है कि इसी कब्रिस्तान में चार मजार उन बुजुर्गों के भी हैं, जो हुजूर गरीब नवाज र.अ. के साथ तशरीफ लाये थे। इसी वजह से यह जगह चार यार के नाम से मशहूर है।

अहाता-ए-नूर

हुजूर गरीब नवाज र.अ. के मजार के पूर्वी किनारे पर एक बड़ा अहाता है जो सफेद संगमरमर का बारादरी की शक्ल में बना
हुआ है जो अहाता-ए-नूर कहलाता है। अहाता-ए-नूर में दाखिल होने के चार दर हैं। पूरब, उत्तर, दक्षिण और पश्चिमोत्तर
जो सन्दल खाना मस्जिद में निकलता है।

मजार हजरत ख्वाजा फखरुद्दीन गुरदेजी र.अ.

आप और आपकी बीवी के मजार तोशा खाने में हैं, जो बेगमी दालान से मिला हुआ है और उसका दरवाजा रौजा-ए-मुनव्वरा
के अन्दरूनी हिस्से में खुलता है। आप हजरत ख्वाजा गरीब नवाज र.अ. के करीबी रिश्तेदार, पीर भाई और मुरीद थे। आपकी औलाद खुद्दाम सैयदजादगान कहलीती है जिनको अन्दरूनी गुम्बद खिदमत का हक हासिल है। गुम्बद शरीफ, मजार अक्दस और उसका सभी सामान खुद्दाम हजरात के कब्जे में रहता है। यही खिदमत करते हैं, फूल और सन्दल चढ़ाते हैं और जायरीन को सलाम कराते हैं, गिलाफों और चादरों का चढ़ाना इन्हीं के जिम्मे है।

25 और 26 रजब को आपका उर्स धूमधाम से होता है।

चिल्ला बाबा फ़रीद गंज शकर (र.अ.)

यह वह जगह है जहां बाबा फरीदुद्दीन गंज शकर र.अ. ने चिल्ला किया था। यह जगह मस्जिद सन्दल खाना के पीछे जमीन
के अन्दर है। खास चिल्ला मस्जिद सन्दल खाना के नीचे तहखाने में है, नीचे उतरने के लिए सीढ़ी बनी हुई है। इसका दरवाजा साल भर बन्द रहता है और मुहर्रम की 5 तारीख को खुलता है। उस दिन जायरीनों की लाइन लग जाती है और दूर-दूर के लोग हाजिर होकर जियारत करते हैं।

गुम्बद शरीफ के अन्दर रोशनी

मगरिब की नमाज से करीब बीस मिनट पहले पुराने रिवाज के अनुसार रौजा-ए-मुनव्वरा में बिजली की सभी रोशनी बन्द
कर दी जाती है और खालिस मोम की बनी हुई मोमबत्तियां रोशन की जाती हैं, उन बत्तियों को रोशन करते वक्त नीचे लिखे शेर पढ़े जाते हैं। अन्दरूने गुम्बद के चारों तरफ चैखटों पर आईने लगे हैं और यह शेर उन पर सुनहरी शब्दों में लिखे हुए हैं।

ख़्वाजा-ए-ख्वाजगां मुईनुद्दीन(ख़्वाजाओं के ख़्वाजा मुईनुद्दीन हैं)
अशरफे औलिया-ए-रूए ज़मीं (ज़मीन के बड़े औलियाओं में सबसे बड़े हैं)

आफ्फताबे सपहरे कौनों मकां (आप कौन व मकां के सूरज हैं)
बादशाहे शरीरे मुल्क यकीं (आप अक़ीदत के देश की राजगद्दी के बादशाह हैं)

दर जमाल व कमाल ऊ चे सुख़न (आपके जमाल और कमाल का मुक़ाबला कोई नहीं कर सकता)
ईं मुबैय्यन बवद बहिस्ने हसीं (यह रोशन दली मजजत्रबूत कि़ले के समान है)

मतलऐ दर सिफ़ाते ऊ गुफ़तम (आपकी तारीफ़ में एक मतलापेश कर रहा हूं)
दर इबारत बुवद चू दुर्रे सर्मी (जिसकी इबारत अनमोल मोती है)

ऐ दरत कि़ब्ला गाहे अहले यक़ीं (अक़ीदत मन्दों के लिए आपका दर कि़ब्ला है)
बर दरत मेहरो माह सुदा जबीं (आपके दर पर चांद और सूरज पेशानी रगड़ते हैं)

रूऐ बर दरगहत हमीं सायन्द (आपकी चैखट पर पेशानी रगड़ते हैं)
सद हज़ारां मलिक चू खुसरूए चीं (चीन के राजा जैसे सैंकड़ों बादशाह)

ख़दिमाने दरत हमा रिज़वा (आपके दरबार में ख़दिम गोया जन्नत के पहरेदार हैं।)
दर सफ़ा रोज़ाअत चूं खुल्दे बरीं (आपकी मज़ार मुबारक ख़ुल्दे बरीं की तरह है)

ज़र्रा-ए-ख़के ऊ अबीर सरिश्त (आपके मज़ार मुबारक की ख़ाक का हर ज़र्रा अबीर की तरह है)
क़तरा-ए-आबे ऊ चू माए मोई (आपके दर के पानी की एक एक बूंद जगमगाते मोती की तरह है)

इलाही ता बुवद खुर्शीद व माही (या इलाही जब तक चांद सूरज क़ायम है)
चिरागे चिश्तियां रा रोशनाई (चिश्तियों की चिराग़ को रोशन रख)

रौजा-ए-मुनव्वरा

रौजा-ए-मुनव्वरा और गुम्बद शरीफ का काम सुल्तान महमूद खिलजी के जमाने में शुरू हुआ, मगर कई इतिहासकार
लिखते हैं कि रौजा-ए-मुनव्वरा और गुम्बद शरीफ ख्वाजा हुसैन नागौरी र.अ. ने बनवाई है। गुम्बद का अन्दरूनी हिस्सा पत्थर का है जिनको चूने से जोड़ा गया है। गुम्बद के बाहर का हिस्सा सफेद
है जिस पर चूने का प्लास्टर चढ़ा हुआ है।

गुम्बद के अन्दरूनी हिस्से में सुनहरी व रंगीन नक्श व निगार बने हुए हैं। सफेद गुम्बद पर सोने का बहुत बड़ा ताज लगा है।
इसको नवाब कलब अली खां (रामपुर) के भाई हैदर अली खां मरहूम ने नज्र किया था। मजारे अक्दस का तावीज संगमरमर का है। मजारे अक्दस हमेशा मखमल के कब्र-पोशों से ढका रहता है। उन पर ताजा गुलाब के फूलों की चादरें चढ़ी रहती हैं।
छप्पर-खट के बीच में सुनहारा कटेहरा लगा है जो शहन्शाह जहांगीर ने बनवाकर चढ़ाया था।

बेगमी दालान

गुम्बर शरीफ का सदर दरवाजा पूरब की तरफ है। इस दरवाजे के आगे एक बहुत खूबसूरत और आलीशान दालान है जो
तीन तरफ खुलता है। ह दालान 1053 हिजरी में शहजादी जहान आरा ने बनवाया था। इसलिए इसको बेगमी दालान कहते हैं।

शाहजहानी मस्जिद

यह मस्जिद मजारे अक्दस के पश्चिम की तरफ बनी हुई है। बहुत उम्दा सफेद संगमरमर से बनाई गई है। यह आलीशान
मस्जिद शहजहां बादशाह के हुक्म से बनवाई गयी थी। जुमे की नामज इस मस्जिद में बड़ी शान से होती है। इसको जामा मस्जिद भी कहते हैं। इसकी लम्बाई 97 गज और चैड़ाई 27 गज है। मस्जिद का सेहन बहुत बड़ा है। मजारे अक्दस का जन्नती दरवाजा मस्जिद के मेहराब से बिल्कुल सामने नजर आता है। जुमा की नमाज इस मस्जिद में बड़ी शान से होती है। शाही जमाने से ही यह कायदा है कि जुमे की नमाज के लिए चार बार तोपें चलाई जाती हैं। पहली खुत्बा होने से पांच मिनट पहले, दूसरी खुत्बे के वक्त, तीसरी इकामत के वक्त और चैथी सलाम के वक्त।

औलिया मस्जिद

यह मस्जिद अहाता चमेली और मस्जिद सन्दल खाना से कुछ कदम के फासले पर पूरब की तरफ बनी हुई है। यह मस्जिद
उस जगह पर बनाई गयी है जहां हुजूर ख्वाजा गरीब नवाज र.अ. नमाज पढ़ा करते थे।

मस्जिद सन्दलखाना

इस मस्जिद का बयान अहाता-ए-चमेली के साथ हो चुका है। यह मस्जिद सुल्तान महमूद खिलजी की बनवाई है। जहांगीर
के जमाने में मस्जिद खस्ता व शिकस्ता (टूटी-फुटी) हो चुकी थी। जहांगीर बादशाह ने चार दर बढ़ा कर नयी बनवाई। शहन्शाह औरंगजेब ने इसकी मरम्मत कराई, इस वजह से यह मस्जिद तीनों बादशाहों के नामों से मशहूर है।

उर्स शरीफ के दिनों में एक रजब से नौ रजब तक मजार अक्दस पर पेश करने के लिए सन्दल की घिसाई इसी मस्जिद में
होती है जिसकी वजह से यह सन्दल मस्जिद के नाम से मशहूर हो गयी है।

हुजूर ख्वााज गरीब नवाज र.अ. के मजारे अक्दस से सुबह व शाम जो फूल उतरते हैं वह इसी मस्जिद के एक गहरे ताक में कुछ देर के लिए रखे जाते हैं इस वजह से इस मस्जिद को मस्जिद फूल खाना भी कहते हैं।