तारा गढ़ पर खूनी रात का वाकिया

कुतुबुद्दीन ऐबक के जमाने में सैयद मीरां हुसैन र.अ. तारा गढ़ किले के किलेदार थे और आपका कियाम भी तारा गढ़ पर ही था। सुल्तान कुतुबुद्दीन ऐबक लाहैर में पो खेल रहा था कि अचानक घोड़े से गिरकर मर गया। जब यह खबर अजमेर में पहुंची तो आस-पास के ठाकुर और राजपूत जागीरदारों ने मिलकर अचानक रात के वक्त तारा गढ़ पर हमला कर दिया और किले के अन्दर दाखिल हो गए। अन्धेरी रात थी और मुसलमान बेखबर सो रहे थे। बहुत से गाफिल मुसलमान गाजर मूली की तरह काअ डाले गए, शोर व गुल की आवाज सुनकर मुसलमान बेदार हुए और संभल कर मुकाबले से आ डटे, मगर गिनती के चन्द बहादुर जो चारों तरफ से खूंखार दुश्मनों में घिरे हुए थे कब तक मुकाबला करते। सबने जामे शहादत नोश किया। दिन निकलने से पहले ही दुश्मन फरार हो गए। इस लड़ाई में हजरत मीरां सैयद हुसैन खुनक सवार र.अ. भी शहीद हो गए।

सुबह होते ही शहर के मुसलमानों को तारा गढ़ के अलमनाक वाकिए की खबर मिली और घर-घर मातम छा गया।
ख्वाजा गरीब नवाज र.अ. ने जब यह दर्दनाक खबर सुनी तो अपने साथियों को लेकर किले में गए और नमाजे जनाजा पढ़कर तारा गढ़ के शहीदों को दफन कर दिया। किला तारा गढ़ अब किला नहीं रह गया। इसकी दीवारें कमजोर हो चुकी हैं लेकिन हजरत मीरां सैयद हुसैन खुनक सवार र.अ. की दरगाह यहां जियरतगाह खास व आम है।

हजरत मीरां सैयद हुसैन र.अ. बहुत मुत्तकी और परहेजगार बुजुर्ग थे। आप अक्सर हुजूर ख्वाजा गरीब नवाज र.अ. की खिदमत में रहा करते थे। आपको ख्वाजा गरीब नवाज र.अ. से बेहद अकीदत व मुहब्बत थी। आपका उर्स मुबारक रजब को हर साल होता है।

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