सुल्तानुल हिन्द अजमेर में

अजमेर पहुंचकर आपने शहर से बाहर एक सायादार पेड़ के नीचे कि़याम फरमाया। अभी बैठे ही थे कि चन्द ऊंट वालों ने आकर बड़े सख़्त शब्दों में कहा-‘यहां से हट कर कहीं और बैठो, यह जगह राजा के ऊंटों के बैठने की है। हुजूर ग़रीब नवाज़ र.अ. ने कहा-‘ऊंटों को कही भी बिठा सकते हो, बहुत जगह पड़ी है।’ मगर ऊंट वाले न माने और जबरदस्ती पर उतर आए। इसलिए सरकार ग़रीब नवाज़ र.ब. ने नर्मी से फरमाया-‘लो बाबा ! हम यहां से उठ जाते हैं, तुम्हारे ऊंट ही बैठे रहेंगे। यह कहकर आप अपने मुरीदों के साथ आना सागर के किनारे जाकर एक पहाड़ी पर ठहर गये। दूसरी सुबह ऊंट वालों ने लाख कोशिश की मगर ऊंट खड़े न हो सके। ऐसा मालूम होता था कि जमीन ने उन्हें पकड़ लिया हैं यह हालत देखकर ऊंट वाले बहुत परेशान हुए, जब उनकी कोई तदबीर काम न आयी तो मजबूर होकर राजा पृथ्वीराज के दरबार में तारागढ़ पर हाजिर हुए। राजा ने जब उनकी जबानी यह अजीब व ग़रीब माजरा सुना तो हैरत में पड़ गया। उसे अपनी बहादुरी पर बड़ा नाज (गर्व) था, लेकिन ख़्वाजा साहब र.अ. की इस पहली ही करामत से उसकी सारी बहादुरी धरी की धरी रह गयी। लाचार होकर उसने ऊंट वालों को हुक्म दिया कि जाओ उसी फकीर से माफी मांगो जिसकी बद्दुआ का यह नतीजा है, ताकि ऊंट खड़े हो जाएं। अतः सब ऊंट वालों ने हुजूर ग़रीब नवाज र.अ. की खि़दमत में हाजिर होकर बहुत आजिज़ी से माफी मांगी, आपने माफ कर दिया और फरमाया-‘जाओ ! खुदा की मेहरबानी से तुम्हारे ऊंट खड़े हो जायेंगे।’ ऊंट वालों ने जब वापस आकर देखा तो उनकी खुशी और आश्चर्य की कोई सीमा न रही क्योंकि उनके सब के सब ऊंट खड़े थे।

हुजूर ग़रीब नवाज़ र.अ. और आपके साथी रोज आना सागर के पास घाट पर वुजू और गुस्ल (स्नान) किया करते थे, चूंकि घाट पर मन्दिरों की इमारतें थीं, इसलिए मन्दिरों के पुजारियों को यह बात सख़्त नागवार गुज़री। एक दिन हुजूर ग़रीब नवाज़ र.अ. के कुछ मुरीद आना सागर पर नहाने के लिए गये, मगर ब्राह्मणों ने उन्हें रोक दिया और सख़्ती पर उतर आये। मुरीद फरियाद लेकर ख़्वाजा ग़रीब नवाज र.अ. की खिदमत में हाजिर हुए। आपने पूरा हाल सुनकर अपने एक मुरीद से फरमाया-‘जाओ, कूज़े (मिट्टी के बर्तन) में तालाब का पानी भर लाओ।’ अतः वह मुरीद आना सागर पर पहुंचकर तालाब का पानी भरने के लिऐ जैसे ही कूज़े को तालाब में डाला, आना सागर का सारा पानी उस कूज़े में आ गया। मुरीद ने कूजे को हुजूर की खिदमत में पेश कर दिया। जब तालाब के सूखने का पुजारियों को पता चला, तो उनके होश उड़ गये। उधर शहर में कोहराम मच गया। लोग पानी के लिए तड़प उठे और यह बात पूरे शहर में फैल गयी कि मुसलमानों को घाट पर मारा-पीट गया था इसलिए उनके गुरु ने सारा पानी गायब कर दिया है। शहरियों का एक गिरोह सरकार ग़रीब नवाज़ र.अ. से बड़ी मन्नत व समाजत से माफी मांगने लगा। आपने दयापूर्वक उस कूज़े का पानी वापस तालाब में डलवा दिया और तालाब पहले जैसा पानी से भर गया। इस वाकिया को देखकर बहुत से लोग ईमान ले आये और इन करामात के बाद अजमेर में इस्लाम बड़ी तेजी से फैलने लगा।

देहली में आगमन

शमाना से रवाना होकर ख़्वाजा ग़रीब नवाज र.ब. देहली पहुंचे। आपने देहली में राजा खांडे राव के महल के सामने कुछ फासले पर अपना कियाम फरमाया और इस्लाम फैलाने का काम शुरू कर दिया। आपका अन्दाजे तबलीग इतना दिलनशीन और आपकी जाते अक्दस इस कदर पुरकशिश थी कि आपके पास आने वालों में ज़्यादातर लोग ईमान ले आते थे। धीरे-धीरे मुसलमानों की तादाद बढ़ना शुरू हो गयी और कुछ ही समय में देहली में इस्लाम के इस तेजी से फैलने से तहलका मच गया। आखिरकार शहर के कुछ बा-असर लोग खांडे राव हाकिम के पास गये और अर्ज किया कि इन पापी (नाऊजुबिल्लाह) मुसलमान फकीरों की आमद से हमारे देवता नाराज हो गये हैं। अगर तुरन्त इनको यहां से निकाला नहीं गया तो डर है कि देवताओं का कहर सल्तनत की तबाही का कारण बन जायेगा। खांडे राव ने हुक्म जारी कर दिया कि फकीरों को देहली से तुरन्त निकाल दिया जाए, लेकिन उसकी कोई चाल कामियाब न हुई क्योंकि हुकूमत के आदमी जब कोई कार्यवाही करने के लिए आपके पास आते तो आपके बर्ताव, उच्च व्यक्तित्व और सत्यवादित से इस तरह आकर्षित होते कि तुरन्त इस्लाम कुबूल करके आपके जांनिसारों में शामिल हो जाते।

खांडे राव का जब कोई बस न चला तो उसने एक शख्स को कुछ लालच देकर इस बात पर राजी कर लिया कि वह सरकार ग़रीब नवाज़ र.अ. को कत्ल कर दे। वह शख्स अकीदतम बन कर हाजिर हुआ, आप पर इसकी आमद का मकसद जाहिर हो गया और आपने फरमाया-‘इस अकीदतमन्दी से क्या फायदा, जिस काम के लिए आया है क्यों नहीं करता।

इस बात को सुनकर वह कांपने लगा और बगल में दबा हुआ खंजर जमीन पर गिर पड़ा। इस रोशन ज़मीरी को देखकर वह शख्स आपके कदमों मे गिर पड़ा और ईमान लाकर इस्लाम दाखि़ल हो गया।

जब ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ र.अ. ने यह देखा कि अब देहली में इस्लाम की काफी चर्चा हो चुकी है, तो आपने अपने ख़लीफा-ए-अकबर हज़रत ख़्वाजा कुतुबुद्दीन बखि़्तयार काकी र.अ. को इस्लाम फैलाने के लिए वहां छोड़ा और खुद अपने चालीस जांनिसारों के साथ अजमेर के लिए रवाना हो गये। इस सुर में आपने तबलीग व हिदायत का काम सुन्दर तरीके के अन्जाम दिया कि अजमेर पहुंचते-पहुंचते सैंकड़ों आदमी आपके साए में ईमान लाकर मुसलमान हो चुके थे।

ख्वाजा साहब र.अ. हिन्दुस्तान की जमीन पर

सब्जावार से रवाना होकर हजरत ख़्वाजा गरीब नवाज र.अ. गजनी पहंुचे। वहां सुलतानुल मशाइख शेख अब्दुल वाहिद र.अ. से मुलाकात हुई। आपके साथ हजरत कुतुबुल अक्ताब ख़्वाजा कुतुबुद्दीन बखि़्तयार काकी र.आ. शेखुल मशाइख़ हज़रत मुहम्मद यादगार र.अ. और सैय्यिदुस्सादात हज़रत ख़्वाजा फख़रुद्दीन गुरदेजी र.अ. भी थे।

अल्लाह वालों का यह काफिला अब हिन्दुस्तान की सरहद पर था, सामने बड़े-बड़े और ऊंचे पहाड़ रास्ता राके खड़े थे लेकिन हुजूर ख़्वाजा ग़रीब नवाज र.अ. का अज़्म (इरादा) और हिम्मत उन पहाड़ों से ज्यादा अटल और मजबूत था। आपने अल्लाह का नाम लेकर कदम आगे बढ़या और उन देव जैसे पहाड़ों, घाटियों और दुश्वार रास्तों को पार करते हुए हिन्दुस्तान के सरहदी इलाके पंजाब में दाखिल हो गए।

जिस वक्त हजरत ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती र.अ. हिन्दुस्तान में दाखिल हुए सुलतान शहाबुद्दीन मुहम्मद गौरी और उसकी फौज पृथ्वीराज से हार कर गजनी की तरफ वापस जा रही थी। उन लोगों ने ख़्वाजा साहब र.अ. और आपके हमराहियों से कहा कि आप लोग इस वक्त आगे न बढ़ें बल्कि वापस लौट चलें क्योंकि मुसलमानों के बादशाह की हार हुई है, आगे बढ़ना आपके लिए ठीक नहीं हैं अल्लाह वालों के इस गिरोह ने जवाब दिया कि तुम तलवार के भरोसे पर गये थे और हम अल्लाह के भरोसे पर जा रहे हैं। अल्लाह वालों का यह काफिला आगे बढ़ता रहा। किला शादमान और मुलतान होता हुआ दिया-ए-रावी के किनारे पहुंच गया।

दरिया-ए-रावी के उस पार पंजाब की राजधानी लाहौर आबाद थी ओर उसके मन्दिरों और शिवालयें की ऊंची-ऊंची और सुनहरी कलगि़यां दूर से ही बता रही थी कि यह शहर बड़ी अज़मत और शान वाला है। ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ र.अ. और आपके हमराहियों ने दरिया पार करके शहर से बाहर हज़रत अली बिन उस्तान हिजवेरी उर्फ दाता गंज बख़्श र.अ. के मजार पर कियाम फरमाया जो शहर के करीब था।

हज़रत दाता गंज बख़्श र.अ. अपने वक्त के बेमिसाल आलिम-व-फाजिल, आबिद व जाहिद और बड़े कामिल बुजुर्गों में से एक थे। हुजूर ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ र.अ. ने यहां एतिकाफ फरमाया और दिली सुकून हासिल किया,। फिर वहां से रवाना हुए। रवाना होते वक्त आपने हजरत दाता गंज बख्श र.अ. की शान में निम्नलिखित शेर पढ़ा-

गंज बख़्शे फैजे आलम मज़हरे नूरे खुदा,
नाकिसांरा पीरे कामिल कामिलांरा रहनुमा।

(गंज बख्श ने दुनिया की भलाई की लिए खुदा के नूर की लहर फैलाई है। गुनहगारों के लिए योग्य गुरु और जानकारों के
लिए रहनुमा (पथ प्रदर्शक) हैं।

यह शेर ग़रीब नवाज र.अ. की जबाने मुबारक से अगरचे बेसाख्ता निकला था, लेकिन यह आपके सच्चे जज़्बात व एहसासात का आईनादार है और इसकी मक़बूलियत (लोकप्रियता) का यह आलम है कि आज तक लोग इसे बतौर वज़ीफा पढ़ते हैं।

ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ र.अ. लाहौर से रवाना होकर शमाना (पटियाला) में पहुंचे। वहां के लोग देखने में तो आपक हमदर्द मालूम होते थे मगर अन्दर से आपको नुकसान पहुंचाना चाहते थे। असल में बात यह थी कि दिल्ली और अजमेर के राजा पृथ्वीराज की माग इल्मे नुजूम (ज्योतिष विद्या) की जानने वाली थी। उसने अपने इल्म से अपने बेटे को आगाह (सचेत) कर दिया था कि ऐसी शक्ल व सूरत और हुलिया का एक शख्स उसके राज में आयेगा जो तेरी तबाही का कारण बनेगा। राजा ने इसी कथन के अनुसार चित्रकारों से तस्वीरें बनवायीं और सरहदों पर भेज दीं। साथ ही साथ यह हुक्म दिया कि इस सूरत का शख्स जहां भी मिले तुरन्त कत्ल कर दिया जाए। जब ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ र.अ. शमाना में पहुंचे तो राजा के आदमियों ने आपको उसी शक्ल व सूरत का पाकर आपको रोकना चाहा। ख्वाजा साहब को बजरिए कशफ (अंतज्र्ञान) मालूम हो गया कि मेजबानों की नीयतें बिगड़ी हुई हैं और वे लोग आपके साथ दगा व फरेब करना चाहते हैं, इसलिए आप अपने हमराहियों को लेकर वहां से इस तरह बचकर निकल गये कि दुश्मनों को खबर तक न हुई।

ख्वाजा साहब र.अ. हिन्दुस्तान की राह पर

हिरात से कूच करके ख़्वाजा साहब र.अ. सब्जावार पहुंचे। सब्जावार का हाकिम शेख़ मुहम्मद यादगार बड़ा जालिम, निर्दयी और बदअख़लाक शख्स था। शीया मजहब रखता था और खलीफाओं के नाम का दुश्मन था। उसने शहर के बाहर एक बाग लगवाया था जो बड़ा सुन्दर था। ख़्वाजा साहब र.अ. उस बाग में दाखिल हो गए और हौज में नहाये और नमाज अदा करके कुरआन पाक की तिलावत करने लगे। इत्तिफाक की बात है कि बाग का हाकिम सैर व तफरीह के लिए आने वाला था। बाग के मालियों ने आपसे कहा कि बाग में न ठहरें, क्योंकि अगर हाकिम ने देख लिया तो ख़ैर नहीं। आपने फरमाया-‘तुम इसका ख़ौफ न करो।’ इतने में खबर आयी कि हाकिम की सवारी आ गयी, नौकर अदब से खड़े हो गये।

ख़्वाजा साहब के ख़ादिम ने कहीं सुन लिया था कि हाकिम फकीरों और औलियाओं के बारे में अच्छा ख्याल नहीं रखता, मुमकिन है कोई नुकसान पहुंचाये, इस ख़्याल से उसने ख़्वाजा साहब से अर्ज किया-‘बाग में अब बैठना मुनासिब नहीं, अगर कुछ हरज न हो तो किसी दूसरी जगह तशरीफ ले चलें ? आपने मुस्कराते हुए फरमाया-‘ख़ौफ न करो और किसी पेड़ की आड़ में बैठकर कुदरत का तमाशा देखो।’

जब हाकिम बाग में आया तो आप कुरआने पाक की तिलावत कर रहे थे। आपको अपनी गद्दी के पास ही बैठा देखकर उसको सख्त गुस्सा आया और उसने अपने नौकरों को डांटा और कहा-‘इस फकीर को यहां से क्यों नहीं उठाया ?’

सभी नौकर घबरा गये और ख़ौफ से कांपने लगे। ख़्वाजा ग़रीब नवाज र.अ. ने जो नज़र उठाकर उसकी तरफ देखा तो वह हुजूर का रौब व जलाल देखते ही कांप उठा और बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़ा।

मुहम्मद यादगार के नौकरों ने जब यह देखा तो बहुत परेशान हुए और ख़्वाजा साहब की खि़दमत में हाजिर होकर आजिज़ी से माफी मांगी औद दया की दरख़्वास्त की।

ख़्वाज साहब र.अ. ने दया करके अपने ख़ादिम को बुलाया और हुक्म दिया कि बिस्मिल्लाह पढ़ कर इसके मुंह पर पानी छिड़को। ख़ादिम ने जैसे ही उसके मुंह पर पानी डाला, होश में आ गया। बहुत शर्मिन्दा हुआ और अपनी बदसुलूकी की माफी मांगने लगा। आपने उसकी बात को नजरअंन्दाज करते हुए फरमाया-‘तू मुझसे माफी मांगता है और रसूलुल्लाह स.अ.व. की दिन आजारी करता है। रसूलुल्लाह स.अ.व. के उच्च खानदान के साथ मुहब्बत का दावा करना और उनकी पैरवी न करना बेमायने हैं।

हुजूर ग़रीब नवाज र.अ. ने महान सहाबियों के गुण कुछ इस अन्दाज से बयान किए कि सभी हाज़रीन दंग रह गए। शेख़ मुहम्मद यादगार और उनके साथी रोने लगे। हज़रत ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ र.अ. की इस नसीहत का सब्जावार के हाकिम पर बड़ा असर हुआ और वह आपकी विचारधारा में शामिल होकर आपका शागिर्द बन गया।

अब शेख ने अपना सब माल नकद और दूसरी चीजें ग़रीब नवाज़ र.अ. की खि़दमत में पेश कर दी, लेकिन आपने उसे कुबूल नहीं किया और फरमाया-‘जिन लोगों से तुमने यह माल जबरन वसूल किया है उन्हीं के हवाले कर दो ताकि कल कियामत के दिन कोई शख्स तुम्हारा दामन न पकड़े। लिहाजा उन्होंने हुजूर के फरमान के मुताबिक जिनका माल था उनको लौटा दिया और जो कुछ बाकी बचा उसे फकीरों और अनाथों में तक्सीम (बांट) दिया। दुनिया को छोड़कर ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ र.अ. की संगत में रहने लगे। ख्वाजा साहब ने आपको खिलाफत अता फरमाकर हिसार शहर की विलायत बख्शी, मगर आप ख़्वाजा साहब र.अ. की जुदाई बर्दाश्त न कर सके और हमेशा आपके साये में रहे। ख़्वाजा साहब र.अ. की वफात के बाद भी मजारे मुबारक पर खादिम बन कर आखरी दम तक खिदमत करते रहे। आपका मजार मुबारक रौजा-ए-अक्दस के करीब ही शुमाल मशरीक (पूर्वोत्तर) दिशा में अब भी मौजूद है।

हजरत शेखुल मशाइख मुहम्मद यादगार र.अ. की औलादें अब तक अजमेर शरीफ में मौजूद हें उनको हजरत ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ र.अ. के मजारे मुबारक की खिदमत का हक हासिल है। यह शेखजादे कहलाते हैं।

ख़्वाजा साहब र. अ. दोबारा पीर व मुर्शिद की खि़दमत में

रौज़ा-ए-अक़्दस से रुख़्सत (विदा) होकर ख़्वाजा ग़रीब नवाज र.अ. वापस बग़दाद शरीफ पहुंचे। उन दिनों आपके पीर व मुर्शिद हजरत ख़्वाजा उस्मान हारूनी र.अ. भी बग़दाद में मौजूद थे। आप उनकी खि़दमत में हाजि़र हुए और इर्शादे नबवी स.अ.व. से आपको आगाह किया। यह सुनकर आप बहुत खुश हुए और मुस्कराकर फरमाया-‘अब हम ऐतिकाफ में रहेगे और हुजरे से बाहर नही ओयेंगे।’

हज़रत ख़्वाजा ग़रीब नवाज र.अ. रोज़ाना सूरज निकलने के बाद अपने मुर्शिद की खि़दमत में हाजिर होते और रूहानी तालीम हासिल करते यह सिलसिला अठ्ठाईस रोज तक जारी रहा। इस दर्मियान में आपने जो कुछ अपने पीर व मुर्शिद की जबाने मुबारक से सुना उसे कलमबन्द कर लिया (लिख लिया)। इस तरह अठ्ठाईस रोज में अठ्ठाईस बाब (अध्याय) का एक रिसाला तैयार हुआ जिसका नाम ‘अनीसुल अरवाह’ रखा।

आखिरी रोज हजरत शेख़ ने ख़्वाजा साहब को अपना असा-ए-मुबारक, मुसल्ला और महान खिरका अता फरमाया।
बाद में वह तबर्रुकात मुस्तफवी स.अ.स. जो खानदाने चिश्त में सिलसिला-ब-सिलसिला चले आ रहे थे आपको सौंप कर फरमाया-‘लो, ये मेरी यादगार है, इनको इस तरह अपने पास रखना जिस तरह हमने रखा और तुम जिसको इस लायक समझो उसको सौंप देना। लायक फरज़न्द वहीं है जो अपने पीर के इर्शादात को अपने होश व गोश में जगह दे और उस पर अमल करना अपन मामूल बना ले। इस इर्शाद के बाद आपने अपने मुरीद हज़रत ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती र.अ. को रुख़्सत किया और खुद अल्लाह की याद में मग्न हो गये।

पीर व मुर्शिद से विदा होकर आप बग़दाद शरीफ से रवाना हुए और सफर के दौरान बदख़्शां, हिरात और सब्ज़वार भी गए। बल्ख से गुजरते हुए आपने वलीये कामिल बुजुर्ग शेख़ अहमद खिजरुया र.अ. की खानकाह मे कुछ रोज़ कि़याम फरमाया और फिर वहां से सफर का समान बांधा।

हज़रत ग़रीब नवाज़ र.अ. की आदत थी कि जब भी सफर करते अपने साथ तीर व कमान, चकमाक और नमकदान जरूर रखते ताकि सफर में किसी किस्म की तक्लीफ न हो। जब ज़्यादा भूख लगती तो जंगल से कोई परिन्दा शिकार करके गुज़र कर लेते। एक दिन आपको भूख ने ज्यादा परेशान किया तो आप शिकार की तलाश में निकले, सामने एक कुलन्ग नज़र आया। आपने जो तीर कमान से जोड़कर मारा तो वह जमीन पर आ रहा। आपने उसे जि़ब्ह करके ख़ादिम के हवाले किया ताकि भून ले और खुद नमाज़ पढ़ने मे लग गये।

जिस जगह आप नमाज पढ़ रहे थे उसके करीब ही एक मशहूर फल्सफी और हकीम का घर था। उनका मदरसा जारी था और दूर-दूर से तालिबे इल्म (विद्यार्थी), इल्म हासिल करने के लिए आते थे। उन हकीम साहब का नाम जियाउद्दीन था। उनको अपने फलसफा (यानी दर्शन शास्त्र ) पर बड़ा नाज़ था । और इसी वजह से औलिया अल्लाह का जि़क्र बड़े मजाक के अन्दाज में किया करते थे जिसका लोगों पर बुरा असर पड़ता था।

जहां ख़्वाजा साहब र.अ. नमाज पढ़ रहे थे और ख़ादिम कुलन्ग भून रहा था, हकीम जियाउद्दीन का वहां से गुज़र हुआ। उनकी नज़र जो ख़्वाजा साहब र.अ. पर पड़ी ता एकदम वहीं ठिठक कर रह गये। जब ख्वाजा साहब र.अ. नमाज से फारिग हुए तो उसने आपके रूए मुबारक में कुछ ऐसा जलवा देखा कि फल्सफा और हिकमत की तमाम बातें भूल गया और सलाम करके अदब से बैठ गया। इतने में ख़ादिम ने कुलन्ग भून कर ख़्वाजा साहब र.अ. की खिदमत में पेश किया। हुजूर ने उसकी एक टांग हकीम साहब को दी और दूसरी रान (गोश्त) खुद खाने लगे, बाकी ख़ादिम के हवाले कर दिया।

हकीम ने अभी पहला ही लुक्मा मुंह में डाला था कि बातिल (झूठ) का परदा चाक हो गया और हकीकत के आईने सामने आ गए, अक्ल व फल्सफे के सबब जो पूरे ख़्यालात उनके दिमाग में भरे हुए थे सब निकल गए, दिल पर ऐसी घबराहट पैदा हुई कि बेहोश हो गए, ख़्वाजा ने एक और लुक्मा उनके मुंह में डाल दिया। जैसे ही यह लुक्मा हल्क से नीचे उतरा बदहवासी कम हुई और होश में आ गये, अपने पिछले ख़्यालात पर बहुत शर्मिन्दा हुए और तौबा करके माफी मांगी। इसके बाद अपने सभी शागिर्दों के साथ हुजूर ग़रीब नवाज़ र.अ. के पैरों (मुरीद) हो गये।

जिस वक्त ख़्वाजा ग़रीब नवाज र.अ. का गुजर समरकन्द से हुआ तो आपने देखा के ख़्वाजा अबुल लैस समरकन्दी र.अ. के मकान के पास ही एक मस्जिद बन रही थी और एक होशियार आदमी कि़ब्ला की सिम्त (दिशा) पर ऐतराज कर रहा था। किसी तरह समझाये नहीं समझता था। आपने उसकी गरदन पकड़कर कहा-‘देख सामने क्या है।’ उसने क़ाबा शरीफ देख लिया और मान गया।

जब ख़्वाजा साहब र.अ. बदख़्शां में पहुंचे तो वहां इनकी मुलाकात एक बुजुर्ग से हुई, जिनकी उम्र एक सौ चालीस साल की थी। यह बुजुर्ग हज़रत जुनेद बग़दादी र.अ. की औलाद में से थे और उनका एक पैर कटा हुआ था। मालूम करने पर उन्होंने फरमाया कि काफी समय से एतिकाफ में रहकर इबादत में मशगूल था। एक दिन ख़्वाहिश ने मजबूर किया और इस पांव को जो कटा हुआ है आगे बढ़ाया ही था कि ग़ैब से आवाज आयी-‘ऐ मुद्दई ! यही वायदा था जो फरामोश कर दिया।’

बस इस आवाज़ को सुनना था कि ख़ौफ से बेकरार हो गया और उसी वक्त पांव काट कर फैंक दिया। इस घटना को चालीस साल गुज़र चुके हैं और यह बात दिल से निकलती नहीं है कि कल कि़यामत के दिन दुरवेशों के सामने क्या मुंह दिखाऊंगा।

इसके बाद हिरात में पहुंचकर ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ र.अ. हज़रत उबैदुल्लाह अन्सारी र.अ. के मज़ार मुबारक पर हाजिर हुए, मजार मुबारक पर अल्लाह तआला की हैबत तारी थी, इसलिए आप होशियार रहते थे। वहां आपने काफी समय इबादत में गुज़ारा। रात भर इबादत में लगे रहते और कई बार इशा की नमाज के वुजू से फज्र की नमाज अदा करते थे। जब हिरात में आपकी शोहरत बढ़ गयी और लोग आपकी खि़दमत में आने लगे तो आप वहां से रुख़्सत हुए ओर सीधे हिन्दुस्तान की तरफ चल पड़े।

ख़्वाजा साहब र.अ. रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के दरबार में

मक्का मुअज्जमा से रवाना होकर हज़रत ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ र.अ. मदीना मुनव्वरा आये और बड़ी आजिज़ी से दरबार रसूलुल्लाह में हाजिरी दी। रोजाना मस्जिदे नबवी में पांचों वक्त की नमाज पढ़ते और ज़्यादातर वक्त रौज़ा-ए-अक़्दस के करीब हाजि़र रहकर दरूद व सलाम पेश करते रहते। एक दिन वक़्त नमाजे फज्र पढ़ने के बाद पूरी मस्जिदे नबवी के नमाजी रोज़ा-ए-अक़्दस के करीब दरूद व सलाम पढ़ कर अदब व एहतराम से रुख़्सत होते जा रहे थे कि अचानक आवाज़ आई-‘मुईनुद्दीन को बुलाओ।’

रौज़ा-ए-मुबारक के शेख़ ने मस्जिद के मेहराब में खड़े होकर आवाज़ दी-‘मुईनुद्दीन हाजि़र हो।’

इस मजमे में जितने भी मुईनुद्दीन नाम के शख़्स मौजूद थे, शेख़ की आवाज पर लब्बैक-लब्बैक कहते हुए हाजि़र हो गये।
अब शेख़ हैरान हैं कि किस मुईनुद्दीन को सरकार ने बुलाया है। मालूम करने पर हुजूर स.अ.व. ने फरमाया-‘मुईनुद्दीन चिश्ती को हाजि़र करो।’

ख़्वाजा मुईनुद्दीन लब्बैक-लब्बैक कहते हुए शेख़ के क़रीब पहुंच गये। शेख़ ने आपको रौज़ा-ए-अक़्दस तक पहुंचा दिया
और अर्ज किया-`या रसूलल्लाह ! मुईनुद्दीन चिश्ती हाजि़र है।`

रोज़ा-ए-अक़्दस का दरवाज़ा अपने आप खुल गया और इर्शादे नबवी स.अ.व. हुआ-‘ऐ कुतुबुल मशाइख़ अन्दर आओ।’

हुजूर ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ र.अ. वजदानी हालत में रोज़ा-ए-अक़्दस के अन्दर दाखिल हुए और तजल्लियाते नबवी में बेखुद व सरशार हो गये। जब दिली सुकून हासिल हुआ तो हुक्म हुआ-‘ऐ मुईनुद्दीन ! तू हमारे दीन का मुईन (मददगार) है। हमने हिन्द की खि़लाफत तुझे अता की। हिन्दुस्तान जा और अजमेर में कियाम कर, वहीं से तब्लीगे इस्लाम करना।

ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ र.अ. बड़े अदब व एहतराम से रौज़ा-ए-अक़्दस से बाहर निकले। आप पर एक खास कैफियत तारी थी। जब इस हालत से बेदार हुए और दिली सुकूलन मिल गया तो आपको फरमाने रिसालत याद आया, मगर हैरान थे कि हिन्दुस्तान किधर है और अजमेर कहां है ? इसी फिक्र में थे कि शाम हो गई और सूरज डूब गया। इशा की नमाज के बाद आंख लगी और आप सो गये। ख़्वाब की हालत में हिन्दुस्तान का नक्शा और अजमेर का मन्जर आपके सामने था। जब नींद से आंख खुली तो सज़्दा-ए-शुक्र अदा किया और रौज़ा-ए-अक़्दस पर हाजिर होकर तोहफा-ए-दरूद व सलाम पेश करके हिन्दुस्तान की जानिब रवाना हुए।

हुजूर ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ र.अ. अपने सफर के दौरान मुल्क शाम भी गये, मगर यह पता नहीं है कि आप वापसी में शाम गये या जाती दफा इधर से गुज़रे।

ख़्वाज़ा ग़रीब नवाज़ र.अ. इस सफर का हाल खुद बयान फरमाते हैं-

एक बार मैं एक शहर में पहुंचा जो शाम के पास है वहां एक बजुर्ग एक गार (गुफा) में रहा करते थे। उनके बदन का गोश्त (मांस) सूख गया था, सिर्फ हड्डियां बाकी थीं। यह बुजुर्ग एक मोटे कपड़े पर बैठे हुए थे और दो शेर दरवाजे पर खड़े थे। मैं उनकी मुलाकात को गया, मगर उन शेरों की वजह से अन्दर जाने की हिम्मत न हुई। शेख़ ने मुझे देखकर फरमाया-‘चले आओ, डरो नहीं।’

यह सुनकर मैं अन्दर चला गया और अदब से बैठ गया। कहने लगे, जब तक किसी चीज का इरादा न करोगे वह भी
तुम्हारा इरादा न करेगी। फिर फरमाया-‘जिसके दिल में ख़ौफे खुदा होता है, हर चीज़ उससे डरती है।

फिर मुझसे पूछा-‘कहां से आना हुआ ?’ ‘अर्ज किया, बग़दाद से’, कहने लगे-‘खुश आमदीद, लेकिन
अच्छा यह है कि दुवेशों की खि़दमत करते रहो, ताकि तुम्हारे अन्दर भी दुरवेशों का जौक पैदा हो।’

फिर फरमाया-‘मुझे कई साल इस गुफा में रहते गुजर गये, एक बात से डरता हूं।’ मैंने पूछा वह क्या बात है।

उन्होंने कहा-‘नमाज़ है जिसके अदा करने के बाद इस ख़ौफ से कि कोई भूल-चूक न रह गयी हो और नमाज़ ही मेरे
लिए इताब (अल्लाह की पकड़) हो जाए, रोता हूं। बस ऐ दुरवेश ! अगर नमाज़ अदा की तो सुब्हान अल्लाह वरना मुफ्त में उम्र बेकार हुई।’

इसके बाद कहने लगे-‘नाम को नियम से पूरा न करना, इससे ज्यादा कोई गुनाह नहीं। मुझे मालूम नहीं कि मेरी नमाज़
खुदा-ए-तआला ने कुबूल फरमाई या नहीं।’

फिर मुझे एक सेब दिया और फरमाया-‘कोशिश करो कि हक्के नमाज़ अदा हो जाए वरना कल कि़यामत के दिन शर्मिन्दगी होगी।