ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ र.अ. के ख़ास-ख़ास ख़लीफ़ा

हजरत ख्वाजा गरीब नवाज र.अ. ने सैर व सियाहत (घूमने) और देहली व अजमेर के लम्बे कियाम के जमाने में सैंकड़ों खलीफाओं को तालीम देकर खुदा के बन्दों की हिदायत के लिए हिन्दुस्तान में अलग-अलग जगह पर भेजा जिन्होंने इसको अपन फर्ज समझा और तेजी से इस्लाम की तब्लीग शुरू कर दी। आपके फरमान के अनुसार कुतुबुल अकताब ख्वाजा कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी र.आ. आपके खलीफा-ए-अकबर थे। आपके मशहूर खलीफाओं की सूची निम्नलिखित है-

काकी र.आ. आपके खलीफा-ए-अकबर थे। आपके मशहूर खलीफाओं की सूची निम्नलिखित है-

नं. नाम तारीख वफात दफन की जगह
1. हजरत ख्वाज कुतुबुद्दीन 14 रबीउल- देहली बख्तियार काकी र.अ. अव्वल 635 हिजरी
2. हजरत इमामुद्दीन दमिश्की र.अ. ना मालूम अजमेर शरीफ
3. हजरत अहमद कहर र.अ. 16 शव्वाल अजमेर शरीफ 630 हिजरी
4. हजरत नियाज अहमद 15 रबीउल अव्वल अजमेर शरीफ 585 हिजरी
5. हजरत अब्दुल गफ्फार 24 सफर मुलतान
6. हजरत अहमद शहाब कूफी 13 शाबान बनारस र.अ. 595 हिजरी
7. हजरत शेख अहमद काबुली मुहर्रमुलहराम बनारस र.अ. 596 हिजरी
8. हजरत दाउदुद्दीन र.अ. 28 मुहर्रम अजमेर शरीफ
9. हजरत कादिर सई र.अ. 19 रजब अजमेर शरीफ
10. हजरत शेख मुहम्मबर यादगार 25 रजब अजमेर शरीफ सब्जवारी र.अ. 648 हिजरी
11. हजरत अब्दुल्लाह बियाबानी – -उर्फ जोगी अजयपाल
12. हजरत मारूफ शहाब र.अ. 19 सफर 638 अजमेर शरीफ 638 हिजरी
13. हजरत गुलाम हादी तुर्क 11 शव्वाल अजमेर शरीफ र.अ. 588 हिजरी
14. हजरत कुरआन अहमद तुर्क 4 रमजान देहली र.अ. 584 हिजरी
15. हजरत अहमद खां गाजी 18 जील्कादा कन्नौज र.अ. 603 हिजरी
16. हजरत अहमद खां दुर्रानी 4 शाबान अजमेर शरीफ र.अ. 603 हिजरी
17. हजरत सुल्तान शाह र.अ. 19 जुमादल ऊला अजमेर शरीफ 593 हिजरी
18. हजरत अब्दुल्लाह असगर 11 शाबान देहली रअ.अ. 640 हिजरी
19. हजरत अबुलफरह कुर्सी 14 जीकाद देहली र.अ. 617 हिजरी
20. हजरत याकूब खां र.अ. 27 मुहर्रम देहली 698 हिजरी
21. हजरत ख्वाजा अहमद शाह 23 सफर देहली र.अ. 681 हिजरी
22. हजरत अब्दुल्ला शाह 23 सफर देहली र.अ. 681 हिजरी
23. हजरत करीम शुऐब 23 रजब देहली बिन महमूद शाह ईरानी र.अ. 672 हिजरी
24. हजरत ख्वाजा मुहीयुद्दीन नामालूम अजमेर शरीफ र.अ.
25. हजरत शेख हमीदुद्दीन नागौरी 5 मुहर्रम देहली र.अ. 643 हिजरी
26. हजरत जहीरुद्दीन र.अ. 8 शव्वाल अजमेर शरीफ 603 हिजरी
27. हजरत ख्वाजा बुरहानुद्दीन 14 रजब अजमेर शरीफ र.अ. 664 हिजरी
28. हजरत सरवर अहमद र.अ. 18 शाबान अजमेर शरीफ 615 हिजरी
29. हजरत अमीर बुरहान जी 16 मुहर्रम अजमेर शरी। सदा सुहाग र.अ. 600 हिजरी
30. हजरत सूफी शेख हमीदुद्दीन 29 रबीउल अव्वल नागौर नागौरी र.अ. 673 हिजरी
31. हजरत शेख अहमद र.अ. 13 मुहर्रम अजमेर 630 हिजरी
32. हजरत शेख मुहम्मद हसन र.अ. ना मालूम ना मालूम
33. हजरत बीब हफज जमाल र.अ. ना मालूम ना मालूम
34. हजरत गरीब असगर र.अ. 21 सफर अजमेर शरीफ 608 हिजरी
35. हजरत मौसयूख इराकी र.अ. 23 मुहर्रम देहली 700 हिजरी
36. हजरत शेख बजीहुद्दीन र.अ. 11 रजब मुल्तान 672 हिजरी
37. हजरत करीम अहमद शाह 4 जिलहज अजमेर शरीफ 612 हिजरी
38. हजरत ख्वाजा सुलेमान ना मालूम ना मालूम करशकी र.अ.
39. हजरत शेख शम्सुद्दीन 17 सफर अहमदाबाद फोकानी र.अ. 674 हिजरी
40. हजरत महमूद अहमद र.अ. 15 मुहर्रम अजमेर शरीफ 607 हिजरी
41. हजरत शाहबान खां तुर्क 14 जुमादल आखिर अजमेर शरीफ र.अ. 617 हिजरी
42. हजरत ख्वाजा हसन ख्यात र.अ. ना मालूम ना मालूम
43. हजरत मुराद बेग र.अ. 27 शव्वाल अजमेर शरीफ 614 हिजरी
44. हजरत हसन दाऊद जी र.अ. 19 रजब अजमेर शरीफ 621 हिजरी
45. हजरत हादी मुहम्मद गफरत 16 जिलहिज देहली र.अ. 609 हिजरी
46. हजरत अजहर खां तुर्क र.अ. 9 शाबान देहली 707 हिजरी
47. हजरत क्यूवान असगर कंधारी 17 जिलहिज देहली र.अ. 615 हिजरी
48. हजरत सुफयान अहमद र.अ. 6 रजब देहली 610 हिजरी
49. हजरत अब्दुल गफ्फार र.अ. 25 रजब अजमेर शरीफ 661 हिजरी
50. हजरत अजीज शाह र.अ. 16 सफर देहली 697 हिजरी
51. हजरत शेख मुहम्मद जाहिद 11 मुहर्रम देहली तुर्क र.अ. 634 हिजरी
52. हजरत फकीर मुहम्मद र.अ. 27 जुमादल आखिर जमरूद 611 हिजरी
53. हजरत शहाब वली र.अ. 16 जुमादल आखिर अजमेर शरीफ 617 हिजरी
54. हजरत शेख मुहम्मद अली ना मालूम ना मालूम
55. हजरत सोगी बहादुर शाह 11 मुहर्रम अजमेर शरीफ र.अ. 618 हिजरी
56. हजरत ख्वाजा यादगार खुर्रम 10 मुहर्रम गजनी र.अ. 640 हिजरी
57. हजरत मर्दआद खां तुर्क 17 शाबान अजमेर शरीफ र.अ. 619 हिजरी
58. हजरत नियामत अहमद सफा 14 जुमादल आखिर अजमेर शरीफ र.अ. 617 हिजरी
59. हजरत शेख सदरुद्दीन र.अ. ना मालूम ना मालूम
60. हजरत ख्वाजा सब्ज यादगारी 21 जिलहिज कन्धार र.अ. 645 हिजरी
61. हजरत ख्वाजा अकबर शाह 19 रमजान अजमेर शरीफ र.अ. 621 हिजरी
62. हजरत मुहम्मद असगर बिहारी 11 रजब देहली र.अ. 697 हिजरी
63. हजरत फतेह मुहम्मद 9 रजब अजमेर शरीफ र.अ. 633 हिजरी
64.हजरत सुल्तान मसऊद गाजी ना मालूम अजमेर शरीफ र.अ.
65. हजरत सुबहान अली खां 9 जिलहिज अजमेर शरीफ हुमकी र.अ. 619 हिजरी
66. हजरत खेख वहीदुद्दीन 9 जुमादल आखिर हिरात खुरासानी र.अ. 645 हिजरी
67. हजरत निजामुद्दीन खां तुर्क 11 रजब देहली र.अ. 620 हिजरी

ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ र.अ. के हौसले और इरादे

यकीं मुहकम, अमल पैहम, मुहब्बत फातहे आलम, जिहादे जिन्दगानी में यह हैं मर्दों की शमशीरें।

हजरत ख्वाजा गरीब नवाज र.अ. ने हिन्दुस्तान में एक जबरदस्त रूहानी और समाज इंकिलाब को जन्म दिया। छूत-छात के इस भयानक माहौल में इस्लाम का नजरिया-ए- तौहीद अमली रूप में पेश किया ओर बताया कि यह सिर्फ एक ख्याली चीज नहीं है, बल्कि जिन्दगी का एक ऐसा उसूल है जिसको मानने के बाद जात-पात की सब ऊंच-नीच बेमायना हो जाती है। यह एक जबरदस्त दीनी और समाज इंकिलाब का एलान था।

इन दिनों, अजमेर राजपूत साम्राज्य का मजबूत केन्द्र और हिन्दुओं का धार्मिक गढ़ था। दूर-दूर से हिन्दू अपनी धार्मिक रस्मों को पूरी करने के लिए वहां जमा होते थे। एक ऐसे जबरदस्त राजनैतिक और धार्मिक केन्द्र में रहने का फैसला, न सिर्फ ख्वाजा साहब र.अ. के पक्के इरादे को बताता है, बल्कि गैर मामूली खुद इतमादी (आत्मविश्वास) का आईनादार है।

खिदमत-ए-खलक (जन-सेवा)

खिदमत-ए-खलक (जन-सेवा) एक रोज एक किसान आपकी खिदमत में हाजिर हुआ, अर्ज किया कि हाकिम ने मेरा खेत जब्त कर लिया है और कहता है। कि जब तक फरमाने शाही पेश नहीं करोगे खेत वापस नहीं मिलेंगे। सिर्फ यही मेरा गुजर-बसर का जरिया था जिसको हाकिम ने बन्द कर दिया है इसलिए मेरी मदद करें और कुतुब साहब को एक सिफारशी खत लिखकर दिया जाए। कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी र.अ. सुल्तान शम्सुद्दीन अलतमश के पीर हैं और जो कुछ इर्शाद फरमायेंगे बादशाह उसे कुबूल कर लेगा।

हजरत ख्वाजा गरीब नवाज र.अ. ने यह सुनकर मुराकबे में सर झुका दिया और थोड़ी देर बाद सर उठाकर कहा-‘अगरचे मेरी सिफारिश से तेरा काम हो जायेगा लेकिन हक तआला ने मुझे तेरे इस काम के लिए मुकर्रर किया है और उसी वक्त किसान को साथ लेकर देहली रवाना हो गये।

हुजूर ख्वाजा गरीब नवाज र.अ. हमेशा अपनी आमद से पहले ख्वाजा कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी र.अ. को आगाह कर दिया करते थे। इस बार आपने कोई इत्तिला (सूचना) नहीं दी। आप जब देहली के करीब पहुंचे तो एक शख्स ने आपको पहचान लिया और तुरन्त कुतुब साहब को खबर कर दी। कुतुब साहब ने बादशाह को सूचित किया और खुद पीर व मुर्शीद के स्वागत के लिए चल दिये।

ख्वाजा कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी र.अ. परेशान थे कि इस बार पीर व मुर्शिद ने अपनी आमद की खबर क्यों नहीं दी। मौका पाते ही ख्वाजा गरीब नवाज र.अ. से बगैर इत्तिला आने की वजह मालूम की। सरकार गरीब नवाज र.अ. ने किसान की तरफ इशारा करके फरमाया-‘इस गरीब के काम के लिए आया हूं।’ और कुल हाल बयान कर दिया। कुतुब साहब ने अर्ज किया-‘आपने इस कदर लकलीफ उठाई, हालांकि अगर आपका खादिम भी बादशाह से फरमाने आली कह देता तो शख्स की मुराद पूरी हो जाती।

ख्वाजा गरीब नवाज र.अ. ने फरमाया-‘जिस वक्त यह शख्स मेरे पास आया बहुत गमगीन और मायूस था। मैंने ध्यान मग्न होकर दरबारे खुदावन्दी में अर्ज किया तो मुझे हुक्म हुआ कि इसके रंज व गम में शरीक होना इबादत के बराबर है। अगर मैं बजाये चलकर आने के वहीं से इस शख्स की सिफारिश लिख देता तो उस सवाबे अजीम से महरूम रहता जो हर कदम पर उसकी खुशी से मुझे हासिल हुआ है।’ कुतुब साहब ने अर्ज किया-‘हुजूर आराम फरमायें और खुद सुल्तान शम्सुद्दीन अलतमश से किसान के हक में फरमान हासिल करके खिदमते आली में पेश कर दिया।

सिमाअ (अल्लाह व रसूल की कव्वाली में तारीफ)

सिमाअ आपकी रूही गिजा थी और आपको उससे लुत्फे खास हासिल होता था। आपको राग से बेहद दिलचस्पी थी। सिमाअ के वक्त आप पर बेखुदी व बेखबरी का आलम बहुत ज्यादा रहता था। अक्सर कई दिन तक मजलिसें सिमाअ जारी रहा करती थी।

अल्लाह के ध्यान में मग्न

हजरत ख्वाजा गरीब नवाज र.अ. पर अक्सर ऐसा होता था कि अल्लाह तआला की याद में इस तरह मग्न हो जाते कि और कुछ खबर न रहा करती थी। आखिरी वक्त में ध्यान व ज्ञान की कैफियत बेहद बढ़ गयी थी। नमाज के वक्त ख्वाजा कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी र.अ. या ख्वाजा हमीदुद्दीन नागौरी र.अ. सामने खड़े होकर ऊंची आवज में ‘सलात सलात’ (नमाज नमाज) पुकारते, आप फिर भी होश में न आते तो कान में सलात पुकारते। इस पर भी आप न हिलते तो आपका शाना (कन्धा) मुबारक हिलाया जाता, उस वक्त आप आंख खोलकर इर्शाद फरमाते-‘रसूलुल्लाह स.अ.व. की शरीअत से छुटकारा नहीं, सुब्हान अल्लाह कहां से आना पड़ता है।’ और फिर वुजू करके नमाज पढ़ते। जब आप पर यह हालत ज्यादा होती तो हुजरे का दरवाजा अन्दर से बन्द कर लेते और यादे इलाही में मशगूल हो जाते। उस वक्त ख्वाजा कुतुबुद्दीन या ख्वाजा हमीदुद्दीन नागौरी र.अ. हुजरे के दरवाजे पर पत्थर के टुकड़े डाल देते और खुद हुजरे के पीछे चले जाते। जिस वक्त हुजूर बाहर निकलते और आपकी नजरे जलाली उन टुकड़ों पर पड़ती तो वह जल कर खाक हो जाते।

इबादत व रियाजत

आपका ज्यादातर वक्त इबादत और अल्लाह की याद में गुजरता था। कुरआन शरीफ पढ़ना आपको बहुत पसन्द था। एक दिन में दो-दो बार कुरआन शरीफ खत्म कर लिया करते थे। अक्सर (अधिकतर) सुबह के वुजू से इशा की नमाज पढ़ते थे। नमाज और रोजे के बड़े पाबन्द थे। रात का ज्यादा हिस्सा पढ़ने में गुजरता थ, अक्सर व बेशतर रातों में इर्शा के वुजू से आपने फज्र की नमाज अदा फरमाई। सारी उम्र में बहुत कम ऐसा हुआ है कि जिसमें आप रोजे से न रहे हों। अक्सर आप लगातार एक-एक हफ्ते तक रोजा रखते थे और जौ की सूखी रोटी से जो वजन में पांच मिसकला से ज्यादा न होती थी इफ्तार (रोजा खोलना) किया करते थे लेकिन आंखों की तासीर का यह आलम था कि आपकी नजर जिस गुनाहगार पर पड़ती वह आपसे अकीदत (श्रद्धा) रखने लगता और फिर कभी गुनाह के पास न जाता।

अख्लाक व आदात (चरित्रा व आदतें)

आप बड़े ही नर्म दिल खुश मिजाज और मिलनसार थे। आपकों गुस्सा बहुत कम आता था बल्कि आता ही नहीं था। जब किसी से बात करते तो मुस्करा देते, आपकी जिन्दगी बहुत सादा लेकिन दिलकश थी। जो कोई मिलने आता तो बहुत खुशी और गर्मजोशी से मिलते, इज्जत से बिठाते और उनके रंज व गम में शरीक होते।

सखावत आपके खानदान की खासियत थी। बचपन में ही आपने बाग व पवन चक्की बेचकर कुल माल व दौलत खुदा की राह में फकीरों व अनाथों में बांट दी थी और बाद में जो कुछ नजराना तोहफे आया करते थे वह सब भी अल्लाह के नाम पर जरूरतमन्दों को दे दिया करते थे। आप बड़े नर्म मिजाज थे। सलाम में हमेशा सबकत (पहल) किया करते थे, आदाबे शरीअत का हमेशा लिहाज रखते थे और सुन्नते नबवी स.अ.व. का हर वक्त ध्यान रखते थे।