क़त्ल हुई लड़के को फिर से जिंदा करना

एक रोज एक औरत रोती-चिल्लाती आपकी खिदमत में हाजिर हुई। बदहवासी व बेताबी में आपसे अर्ज करने लगी-
‘हुजूर ! शहर के हाकिम ने मेरे बेटे को बेकुसूर कत्ल कर दिया है, खुदा कि लिए आप मेरी मदद कीजिये।’

उस औरत की दर्द भरी फरियाद से आपके अन्दर रहम व हमदर्दी पर्दा हो गयी। आप तुरन्त असा-ए- मुबारक हाथ में लेकर उठे और उस औरत के साथ रवाना हो गये। बहुत से खुद्दाम और हाजरीन भी आपके साथ हो गए। जब आप लड़के की बे-जान लाश के पास पहुंचे तो बहुत देर तक चुप रहे और खड़े-खड़े उसकी तरफ तकते रहे, फिर आगे बढ़े और उसके जिस्म पर हाथ रखकर फरमाया-‘ऐ मक्तूल ! अगर तू बेगुनाह मारा गया है तो अल्लाह के हुक्म से जिन्दा हो जा।’ अभी आपकी जबाने मुबारक से ये शब्द निकले ही कि मक्तूल (मुर्दा) जिन्दा हो गया। आपने उसी वक्त फरमाया-‘बन्दे को अल्लाह तआला से इस कदर निस्बत (सम्बन्ध) पैदा करनी चाहिए कि जो कुछ खुदा-ए-तआला की दरगाह में अर्ज करे कुबूल हो जाए। अगर इतना भी न हो तो फकीर नहीं है।

बचपन में लडको को देख कर उसके बादशाह होने की पेशगोई की

कहते हैं कि सैर व सफर के दिनों में एक दिन हजरत ख्वाजा गरीब नवाज र.अ., अवहदुद्दीन किरमानी र.अ. और शेख शहाबुद्दीन सहरवरदी र.अ. एक जगह बैठे हुए किसी मस्अले पर बातचीत कर रहे थे कि सामने से एक कम उम्र लड़का तीर कमान हाथ मे लिए हुए गुजरा। ख्वाजा गरीब नवाज र.अ. ने उसे देखकर फरमाया-‘यह लड़का देहली का बादशाह होगा।’

आपकी यह पेशगोई (भविष्य वाणी) इस तरह पूरी हुई कि वही लड़का सुल्तान शम्सुद्दीन अलतमश के नाम से देहली के तख्त पर बैठा और छब्बीस साल तक बड़े ठाठ से हुकूमत की।

लूटरो को एक नज़र में इस्लाम में ले आना

कहते हैं कि एक बार आप एक घने जंगल से गुजर रहे थे। वहां आपका सामना कुछ कुफ्फार लुटेरों से हो गया जिनका काम यह था कि मुसाफिरों को लूट लेते थे और अगर कोई मुसलमान मुसाफिर होता तो सामान लूटने के अलावा उसे कत्ल भी कर देते थे। जब वे डाकू बुरी नीयत से आपकी तरफ आए तो अजीब तमाशा हुआ। जिस हथियारबन्द (सशस्त्र) गिरोह ने सैंकड़ों, हजारों मुसाफिरों को बिला वजह खाक व खून में तड़पाया था, आपकी एक ही निगाह से थरथरा उठा और कदमों में गिरकर बड़ी आजीजी से अर्ज किया-‘हम आपके गुलाम हैं और नजरे करम के उम्मीदवार हैं।’ जब वह अपने बुरे कामों से तौबा करने लगे तो आपने उनकों कलिमा पढ़ा कर इस्लाम में दाखिल कर लिया और उनको नसीहत फरमायी कि कभी किसी के माल को अपने लिए हलाल न समझें।

चादर मुबारक से क़र्ज़ अदा करवाना

हजरत ख्वाजा कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी र.अ. फरमाते हैं कि मैं जब तक हुजूर गरीब नवाज र.अ. की खिदमत में रहा, कभी आपको नाराज होते नहीं देखा। एक रोज ख्वाजा साहब र.अ. के साथ मैं और एक दूसरा खादिम शेख अली र.अ. बाहर जा रहे थे कि अचानक रास्ते में एक शख्स शेख अली र.अ. का दामन पकड़ कर बुरा-भला कहने लगा। हजरत पीर व मुर्शिद ने उस शख्स से झगड़ा करने की वजह मालूम की। उसने जवाब दिया यह मेरा कर्जदार है और मेरा कर्ज अदा नहीं करता। आपने फरमाया-‘इसे छोड़ दो, तुम्हारा कर्जा अदा कर देगा।’ लेकिन वह शख्स नहीं माना उस पर हजरत पीर व मुर्शिद को गुस्सा आ गया और अपनी चादर मुबारक उतारकर जमीन पर डाल दी और फरमाया-‘जिस कदर तेरा कर्जा है, इस चादर से ले ले मगर खबरदार ज्यादा लेने की कोशिश न करना। उस शख्स ने अपने कर्जे से कुछ ज्यादा ले लिया, उसी वक्त उसका हाथ सूख गया। यह देखकर चिल्लाने लगा और माफी मांगी। आपने उसे माफ कर दिया, उसका हाथ फौरन दुरुस्त हो गया और वह हलका-ए-इरादत में दाखिल हो गया।

चिल्ला बड़े पीर साहब

दरगाह शरीफ में खड़े होकर दक्षिण की तरफ नजर दौड़ाइये तो सामने एक पहाड़ी नजर आती है जिसके ऊपरी सिरे
पर एक हरे रंग का गुम्बद दिखाई देता है। कहते हैं कि इस मुकाम पर हजरत पीराने पीर दस्तगीर र.अ. के मजारे अक्दस की एक ईंट दफन है यही वजह है कि यह मकाम चिल्ला बड़े पीर साहब के नाम से मशहूर हो गया है, वरना हजरत पीराने पीर दस्तगीर र.अ. हिन्दुस्तान में कभी रौनक अफरोज नहीं हुए।

तारा गढ़ पर खूनी रात का वाकिया

कुतुबुद्दीन ऐबक के जमाने में सैयद मीरां हुसैन र.अ. तारा गढ़ किले के किलेदार थे और आपका कियाम भी तारा गढ़ पर ही था। सुल्तान कुतुबुद्दीन ऐबक लाहैर में पो खेल रहा था कि अचानक घोड़े से गिरकर मर गया। जब यह खबर अजमेर में पहुंची तो आस-पास के ठाकुर और राजपूत जागीरदारों ने मिलकर अचानक रात के वक्त तारा गढ़ पर हमला कर दिया और किले के अन्दर दाखिल हो गए। अन्धेरी रात थी और मुसलमान बेखबर सो रहे थे। बहुत से गाफिल मुसलमान गाजर मूली की तरह काअ डाले गए, शोर व गुल की आवाज सुनकर मुसलमान बेदार हुए और संभल कर मुकाबले से आ डटे, मगर गिनती के चन्द बहादुर जो चारों तरफ से खूंखार दुश्मनों में घिरे हुए थे कब तक मुकाबला करते। सबने जामे शहादत नोश किया। दिन निकलने से पहले ही दुश्मन फरार हो गए। इस लड़ाई में हजरत मीरां सैयद हुसैन खुनक सवार र.अ. भी शहीद हो गए।

सुबह होते ही शहर के मुसलमानों को तारा गढ़ के अलमनाक वाकिए की खबर मिली और घर-घर मातम छा गया।
ख्वाजा गरीब नवाज र.अ. ने जब यह दर्दनाक खबर सुनी तो अपने साथियों को लेकर किले में गए और नमाजे जनाजा पढ़कर तारा गढ़ के शहीदों को दफन कर दिया। किला तारा गढ़ अब किला नहीं रह गया। इसकी दीवारें कमजोर हो चुकी हैं लेकिन हजरत मीरां सैयद हुसैन खुनक सवार र.अ. की दरगाह यहां जियरतगाह खास व आम है।

हजरत मीरां सैयद हुसैन र.अ. बहुत मुत्तकी और परहेजगार बुजुर्ग थे। आप अक्सर हुजूर ख्वाजा गरीब नवाज र.अ. की खिदमत में रहा करते थे। आपको ख्वाजा गरीब नवाज र.अ. से बेहद अकीदत व मुहब्बत थी। आपका उर्स मुबारक रजब को हर साल होता है।

अजमेर शरीफ के दूसरे पाक मकामात

चिल्ला हजरत ख्वाजा गरीब नवाज र.अ.
आना सागर के दक्षिण पश्चिम किनारे एक बड़ी पहाड़ी है जिसको सदाबहार पहाड़ी कहते हैं। इसी पहाड़ी के एक कोने में
छोटा सा गार है जिसके ऊपर अब गुम्बद बना हुआ है, पहले पहल ख्वााज गरीब नवाज र.अ. ने यही सुकूतन इख्तियार की थी। चिल्ला शरीफ के अन्दर पत्थर का एक तख्त रखा हुआ है जिस पर बैठकर आप यादे इलाही में मसरूफ रहा करते थे।

चिल्ला कुतुब सासब र.अ.
सदाबहार पहाड़ी के पूर्वी भाग में हजरत ख्वाजा कुतुबद्दीन बख्तियार काकी र.अ. का चिल्ला बना हुआ है, जब आप अजमेर
शरीफ आते तो इसी जगह इबादत करते।

दौलत बाग
आना सागर के पूर्वी किनारे पर शाहजहां बादशाह ने संगमरमर की इमारतें बनवाईं, जिसके बीच में बारह दरी है। यह
जगह बहुत खूबसूरत है। बारह दरी के पूर्वी हिस्से में एक बहुत सरसब्ज और खूबसूरत बाग है यह बाग दौलत बाग के नाम से मशहूर है, अब इस बाग का नाम बदलकर सुभाष बाग कर दिया गया है।

चिल्ला शाह मदार र.अ.
यह चिल्ला अजमेर के पूर्वी पहाड़ पर स्थित है जिसकी ऊंचाई करीब सात सौ फुट है। इस जगह पर हजरत सैयद बदीउद्दीन कुतुबुल मदार मकनपुरी र.अ. का चिल्ला बना हुआ है।
अठ्ठारह जुमादल अव्वल को यहां उर्स होता है। हजरत शाह मदार र.अ. का मजार मकनपुर में है।

ढाई दिन का झोंपड़ा
दरगाह बाजार से एक रास्ता अहाता दरगाह शरीफ के साथ-साथ पश्चिम को जाता है। त्रिपोलिया दरवाजा से आगे
बढ़ने पर मुहल्ला अन्दर कोट की बस्ती शुरू हो जाती है। थोड़ी दूर आगे चल कर दाये हाथ पर एक आलीशान कदीम मस्जिद है और अच्छी खासी ऊंचाई पर सुर्ख पत्थर की बनी हुई जो ढाई दिन का झोंपड़ा या ढाई दिन की मस्जिद के नाम से मशहूर है। सुल्तान शम्सुद्दीन अलतमस ने इस मस्जिद की इमारत में बहुत कुछ तब्दिली करके मरम्मत कराई।

किला तारा गढ़
यह एक बहुत बड़ा किला हे जो दरगाह शरीफ के दक्षिण में एक बहुत ऊंची पहाड़ी पर है। इस पहाड़ी की ऊंचाई आठ सौ फुट
है। राय पिथोरा के जमाने में यह बहुत मशहूर और मजबूत किला था जिसको फतह करना नामुमकिन समझा जाता था, लेकि
सुल्तान शहाबुद्दीन गौरी ने इसको आसानी से फतह कर लिया औ सैयद मीरां हुसैन र.अ. को यहां का किलादार बनाया।

चार यार

जामा मस्जिद शाहजहांनी के दक्षिण दीवार के साथ ही एक छोटा सा दरवाजा है, जो पश्चिम की तरफ खुलता है। इस
दरवाजे के बाहर एक बड़ा कब्रिस्तान है। यह कब्रिस्तान झालरा की दीवार से लेकर जामा मस्जिद के पीछे दूर तक फैला हुआ है। इस कब्रिस्तान में बड़े-बड़े आलिमों, फाजिलों, सूफियों, फकीरों और औलिया-अल्लाह के मजारात हैं। मौलाना शम्सुद्दीन साहब र.अ. भी इसी जगह दफन हैं और मौलाना मुहम्मद हुसैन साहब इलाहाबादी र.अ. भी इसी जगह मदफून हैं। जिनका विसाल मज्लिसे सिमआ में हुआ था। कहा जाता है कि इसी कब्रिस्तान में चार मजार उन बुजुर्गों के भी हैं, जो हुजूर गरीब नवाज र.अ. के साथ तशरीफ लाये थे। इसी वजह से यह जगह चार यार के नाम से मशहूर है।

अहाता-ए-नूर

हुजूर गरीब नवाज र.अ. के मजार के पूर्वी किनारे पर एक बड़ा अहाता है जो सफेद संगमरमर का बारादरी की शक्ल में बना
हुआ है जो अहाता-ए-नूर कहलाता है। अहाता-ए-नूर में दाखिल होने के चार दर हैं। पूरब, उत्तर, दक्षिण और पश्चिमोत्तर
जो सन्दल खाना मस्जिद में निकलता है।

मजार हजरत ख्वाजा फखरुद्दीन गुरदेजी र.अ.

आप और आपकी बीवी के मजार तोशा खाने में हैं, जो बेगमी दालान से मिला हुआ है और उसका दरवाजा रौजा-ए-मुनव्वरा
के अन्दरूनी हिस्से में खुलता है। आप हजरत ख्वाजा गरीब नवाज र.अ. के करीबी रिश्तेदार, पीर भाई और मुरीद थे। आपकी औलाद खुद्दाम सैयदजादगान कहलीती है जिनको अन्दरूनी गुम्बद खिदमत का हक हासिल है। गुम्बद शरीफ, मजार अक्दस और उसका सभी सामान खुद्दाम हजरात के कब्जे में रहता है। यही खिदमत करते हैं, फूल और सन्दल चढ़ाते हैं और जायरीन को सलाम कराते हैं, गिलाफों और चादरों का चढ़ाना इन्हीं के जिम्मे है।

25 और 26 रजब को आपका उर्स धूमधाम से होता है।