सुल्तान शहाबुद्दीन मुहम्मद गौरी सरकार गरीब नवाज र.अ. के कदमों में

जिस वक्त शहाबुद्दीन मुहम्मद गौरी अजमेर में दाखिल हुआ तो शाम का वक्त था और सूरज डूब रहा था। इतने में अजान की आवाज आई। सुल्तान हैरत में पड़ गया और मालूम किया कि यह आवाज कहां से आ रही हैं लोगों ने बताया कि कुछ फकीर आये हुए हैं और रोज पांच वक्त इसी तरह पुकारते हैं। सुल्तान अजान की तरफ बढ़ा। जमाअत तैयार थी सुल्तान जमाअत में शामिल हो गया। सरकार गरीब नवाज र.अ. इमामत फरमा रहे थे। जब नामज खत्म हुई और सुल्तान की नजर सरकार गरीब नवाज र.अ. के चेहरे मुबारक पर पड़ी तो उसके हैरत की कोई इन्तिहा न रही, उसने देखा कि ये वही बुजुर्ग हैं जिन्होंने मुझे ख्वाब में फत्ह की खुशखबरी दी थी, तुरन्त कदमों में गिरना चाहा लेकिन सरकार ने सुल्तान को सीने से लगा लिया। सुल्तान की आंखों में आंसू आ गये और बहुत देर तक रोता रहा। सरकार गरीब नवाज र.अ. ने दुआयें देकर बैठने को कहा। सुल्तान एक तरफ अदब से बैठ गया। जब रोना कम हुआ तो अकीदत व मुहब्बत का नजराना पेश करते हुए मुरीद होने की इल्तजा की। सरकार गरीब नवाज र.अ. ने सुल्तान शहाबुद्दीन की दरख्वास्त मंजूर करते हुए उसको अपने मुरीदों में शामिल कर लिया।

कुछ दिन अजमेर में रहकर सुल्तान शहाबुद्दीन मुहम्मद गौरी ने खुद जाकर देहली पर कब्जा किया और अपने वफादार गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक को हिन्दुस्तान का गवर्नर बनाकर वापस गजनी चला गया। कुतुबुद्दीन ऐबक ने मुल्क के बाकी हिस्सों को फत्ह करने में हैरतअंगेज कामियाबी हासिल की और बहुत जल्द उत्तरी हिन्दुस्तान पर मुसलमानों का कब्जा हो गया।

एक राजा हरिराज ने अजमेर से पृथ्वीराज के बेटे को निकाल बाहर किया। उसने कुतुबुद्दीन ऐबक से फरियाद की। कुतुबुद्दीन ने राजा हरिराज पर चढ़ाई करके उसको कतल किया और कोला फिर अजमेर का राजा बन गया लेकिन इसके साथ ही मीरां सैयद हुसैन र.अ. को अपना नायब बनाकर भेजा जो बड़े रहेजगार बुजुर्ग थे।

मीरां सैयद हुसैन मशहदी र.अ. पहले ही से सरकार गरीब नवाज र.अ. के अकीदतमन्द थे और अब इस कदर अकीदत बढ़ गयी कि ज्यादा वक्त सरकार गरीब नवाज र.अ. की खिदमत में बसर होता था। आपने इस्लाम फैलाने में नुमायां हिस्सा लिया।

फैसला कुन जंग

शहाबुद्दीन गौरी ने दुश्मन को गफलत में पाकर पूरा-पूरा फायदा उठाया और शाम से ही लश्कर बन्दी का हुक्म दे दिया। खेमों और ढेरों को उसी हालत में छोड़कर रातों रात कई मील का चक्कर काटकर पूरे लश्कर के साथ नदी से पार उतर गया। उस वक्त राजा को होश आया और उसके लश्कर में खलबली मच गयी। राजा ने होश हवास को कायम रखा और एक हिस्सा फौज को तुरन्त तैयार करके सामने ले आया फिर बाकी फौज को भी समेट कर मैदान में ला खड़ा किया।

राजा की फौज में तीन हजार हाथी, तीन लाख सवार और बेशुमार पैदल थे। उधर सुल्तान शहाबुद्दीन के पास सिर्फ एक लाख बीस हजार का लश्कर था। इसलिए राजा को अपनी कामियाबी का पूरा-पूरा यकीन था। इसलिए उसने लश्कर की तर्तीब पर कोई खास ध्यान नहीं दिया। सारी फौज को एक ही समय में हमले का हुक्म दे दिया। उधर सुल्तान ने तर्कीब से काम लेते हुए अपनी फौज के चार हिस्से किये और हर एक पर अलग-अलग सिपहसालार मुकर्रर करके बारी-बारी जाकर लड़ने का हुक्म दे दिया। राजपूत इस बहादुरी से लड़े कि सुल्तान की फौज के छक्के छूट गये। उस वक्त सुल्तान एक जंगी चाल चला यानी हार की सूरत बनाकर पीछें हटा, राजपूतों ने पीछा किया, सुल्तान ने जब यह देखा कि उनकी तर्तीब बिगड़ चुकी है, तो उसने दूसरे ताजा दम लश्कर को मैदान मे ला खड़ा किया लेकिन राजा की फौज बुशुमार थी, सुल्तान की चाल कारगर न हुई। लड़ते-लड़ते दोपहर का समय हो गया, सूरज सर पर आ गया, गर्मी का मौसम था और जंग थी के खत्म न होती थी। राजा पृथ्वीराज एक सौ पचास राजाओं को साथ लेकर लश्कर से निकाल और एक पेड़ के साये में पहुंचकर तय किया कि अब एक फैसलाकुन जंग लड़ी जाये। इस पर सबने तलवारों के कब्जे पर हाथ रखकर धर्म और देश पर कट मरने की कसम खाई, शरबत का एक-एक प्याला पिया, तुलसी की पत्ती जबान पर रखी और केसर का टीका अपने माथे पर लगाया और ताजा दम होकर मैदान में आ गये।

अब घमासान की लड़ाई शुरू हो गयी। राजा की फौज सुबह से लड़ते-लड़ते थक चुकी थी। सुल्तान मौका पाकर अपने बारह हजार तलवारबाज बहादुरों को लेकर जो इसके खास गुलाम थे और अब तक जंग में नहीं गये थे लश्कर से निकला और इस तेजी से हमला किया कि आन की आन में राजा की फौज के बीच में घुस गया। सुल्तान के दूसरे सरदारों को भी यह देखकर जोश आ गया और वह भी दायें-बायें जोर देकर राजा की फौज पर टूट पड़े। ताजा दम दस्ते का मुकाबला राजा की थकी हुई फौज के बस से बाहर था। देखते ही देखते हजारों राजपूत तलवार के घाटर उतर गये और राजा की फौज में हलचल मच गयी। उधर जंगी हाथी जिन पर राजा को बड़ा नाज था अपनी ही फौज पर उलट पड़े और हजारों को कुचल डाला। राजपूत सूरमाओं ने बड़ा संभाला लिया मगर उनके बनाए क्या बनता था। गरीब नवाज र.अ. का कौल (कथन) पूरा होना था और होकर रहा।

अभी थोड़ा दिन बाकी था कि राजा की फौज के पैर उखड़ गये और सुल्तान शहाबुद्दीन की फौज उन पर छा गयी। खांडे राव मैदाने जंग में मारा गया और बहुत से हिन्दुस्तान के राजा इस लड़ाई में काम आ गये, बाकी अपनी जान बचाकर भागने में कामियाब हो गये। पृथ्वीराज भी जान बचाकर भागना चाहता था मगर दरिया-ए-सरस्वती के किनारे गिरफ्तार कर लिया गया।

आखिरकार शहाबुद्दीन मुहम्मद गौरी की फतह हुई और इस जंग से उत्तरी हिन्दुस्तान पर मुसलमानों का कब्जा पूरी तरह से हो गया उसके बाद सरस्व्ती, सामाना, कोहराम और हांसी की राजपूत रियासतें आसानी से जीत ली गयीं। अब सुल्तान ने अजमेर का रुख किया। रास्तें में कोई बुकाबला नहीं हुआ बल्कि मरे हुए राजाओं के बेटों ने सुल्तान का शानदार इस्तकबाल (स्वागत) किया और उसकी शरण में आ गये। सुत्तान ने अजमेर पहुंचकर यहां की हुकूमत पृथ्वीराज के एक बेटे कोला को दी और उससे वफादारी का हलफ लिया।

पृथ्वीराज को सुल्तान का पैगाम

सुल्तान शहाबुद्दीन मुलतान से रवाना होकर लाहौर पहुंचा वहां से रुकनुद्दीन को जो अक्ल व तदबीर में अपना जवाब नहीं रखता था, सफीर (सन्देशवाहक) बनाकर राजा पृथ्वीराज के पास अजमेर भेजा। पृथ्वीराज के नाम जो पैगाम सुल्तान ने भेजा था उसका मज्मून था-‘मैं अपने बड़े भाई के हुक्म से जो पंजाब से लेकर खुरासान तक सभी मुसलमानों का बादशाह है हिन्दुस्तान पर लश्कर कशी करने की लिए आया हूं इसलिए पृथ्वीराज को जो हिन्दुस्तान के राजाओं का महाराज है लिखा जाता है कि वह इस्लाम को कुबूल करके राज्य में खून-खराबा न होने दे वरना लड़ाई के लिए तैयार हो जाये।

पृथ्वीराज की नजर से जब यह पैगाम गुजरा तो उसकी कोई परवाह नहीं की और बहुत सख्त जवाब दिया क्योंकि उसको अपनी बहादुरी और राजपूत सूरमाओं पर बहुत नाज था। उसको अपनी सफलता सामने ही नजर आ रही थी। लड़ाई की तैयारी में लग गया, तुरन्त सभी हिन्दुस्तान के राजाओं को सन्देश जारी कर दिया। थोड़े ही समय में तीन लाख राजपूतों का लश्कर इसके झन्डे के नीचे आ जमा।

सुल्तान मुहम्मद गौरी उधर से बढ़ा, इधर से पृथ्वीराज की संयुक्त फौज चली और सरस्वती नदी को बीच में डालकर दोनों लश्करों ने अपने-अपने खेमे लगा दिये। उसी समय सुल्तान के पास पृथ्वीराज का जवाब भी आ गया जिसका मज्मून यह था-

इस्लाम के सिपहसलार को उसके जासूसों द्वारा मालूम हो गया होगा कि धर्म रक्षा के लिए हमारे पास आसमान के तारों से भी ज्यादा लश्कर मौजूद है और अभी हिन्दुस्तान के कौने-कौने से फौजों का आना जारी है, इनमें से एक-एक राजपूत ऐसा बहादुर है जिसकी तलवार से काबूल और कन्धार तक ने पनाह मांगी है। तुम इन तुर्क बच्चों और अफगान जवानों की जवानी पर रहम खाते हुए यहां से वापस लौट जाओ। इसी में तुम्हारी भलाई है वरना देख लो हमारे पास बेशुमार लड़ाई का सामान मौजूद है और जंगी हाथी भी तीन हजार से कुछ ऊपर है। अगर मेरी राय मन्जूर है तो ठीक, वरना याद रखो तुम्हारा एक सिपाही भी यहां से जिन्दा वापस जाने में कामियाब नहीं होगा।’

सुल्तान शहाबुद्दीन यह खत पढ़कर सुस्त पड़ गया। दुश्मन की बेशुमार फौज और अपनी गिनती की फौन उसके सामने थी। अतः उसने जंगी चाल से काम लेते हुए राजा को जवाब में लिखा-‘आपने बड़ी मेहरबानी और मुहब्बत से अच्छा मशविरा दिया है। मगर आपको मालूम है कि मैंने यह लश्कर कशी अपने बड़े र्भाइ के हुक्म से की हे, जब तक वहां से हुक्म न आ जाये, में कुछ नहीं कर सकता । इसलिए वहा से जवाब आने तक मुहलत चाहता हु

राजा ने जब कमजोर जवाब को सुना तो बहुत खुश हुआ, उसके तमाम लश्कर में खुशी मनाई गयी ओर नाच व रंग का बाजार गर्म हो गया।

शहाबुद्दीन मुहम्मद गौरी हिन्दुस्तान के मोर्चे पर

सुल्तान शहाबुद्दीन मुहम्मद गौरी को एक साल पहले तरावजी के मैदान में पृथ्वीराज के मुकाबले में शर्मनाक शिकस्त (हार) हुई थी। और मुश्किल से जान बचाकर गजनी पहुंचा था। इन्तिकाम की आग उसके दिल भड़क रही थी और गुप्त रूप से लड़ाई की तैयारियां कर रहा था, लेकिन किसी को यह उम्मीद न थी कि इस कदर जल्द वह हिन्दुस्तान के मोर्चे पर रवाना हो जायेगा।

सुल्तान के मुबारक ख्वाब ने उसके दिल में एक नया जोश पेदा कर दिया था। आलिमों से अपने ख्वाब के ताबीर सुनते ही उसने लड़ाई के सामान की फेहरिस्त (सूची) मंगलवा कर देखी और लश्कर के कूच का डंका बजवा दिया और आठवे दिन खुद रिकाब में पैर रखकर रवाना हुआ। सभी अफसर हैरत में थे कि इस कदर जल्द तैयारी की क्या वजह हुई और यह लश्कर किस मोर्चे पर जा रहा है मगर किसी की हिम्मत न हुई कि सुल्तान से मालूम करे। जब यह लश्कर पेशावर में आकर ठहरा तो शाही खानदान के एक उम्र रसीदा शख्स ने सुल्तान की खिदमत में हाजिर होकर अर्ज किया-‘हुजूर इस मोर्चे में सामान तो जंगे अजीम (महायुद्ध) का दिखाई देता है लेकिन यह नहीं खुलता कि जाना किधर है ? सुल्तान ने एक ठंडी आह भरी और जवाब दिया। ऐ बुजुर्ग । तुमको मालूम नहीं है कि मुझ पर क्या गुजरी, क्या तुझे पिछले साल की हार याद नहीं रही ? क्या यह हार इस्लाम के नाम पर कोई मामूल सा धब्बा है? तू यकीन कर कि उस दिन से मैंने आज तक न कपड़े बदले हैं और न महल सरा में बिस्तर पर सोया हूं।

बुजुर्ग ने यह सुनकर शहाबुद्दीन गौरी की हिम्मत बढ़ाई और उसको दुआयें दीं, फत्ह का यकीन दिलाया और फरमाया-‘अगर हुजूर का यही इरादा है तो मसलहते वक्त को देखते हुए काम करना चाहिए। आप उन अमीरों और सरदारों के कुसूर माफ कर दें और उन्हें दरबार में बुलाकर इनाम व इकराम से मालामाल करें ताकि वह जान की बाजी लगाकर लड़ें और पिछली बदनामी का धब्बा मिटा दें। सुल्तान को बुजुर्ग का यह कीमती और सही मश्विरा बहुत पसन्द आया। जब लश्कर मुलतान पहंुचा तो तो सुल्तान ने दरबारे आम लगाया और छोटे-बड़े सभी अमीरों और सरदारों को बुलाया , उनकी गलतियाँ माफ़ करके उनसे कहा – ‘ऐ मुसलमानों ! पिछले साल बदनामी का जो धब्बा इस्लाम के माथे पर लगा है वह किसी से छुपा नहीं है इसलिए हर मुसलमान का यह फर्ज है कि उस कलंक के टिके को अपनी तलवारों के पानी से धो कर साफ करे। सभी सरदारों ने अपनी तलवारों के कब्जे पर हाथ रखकर झुका दिया, जैसे जबाने हाल से कह रहे थे कि हमारा वायदा पक्का है और हम उसे आखिरी सांस तक निभायेंगे।

शहाबुद्दीन मुहम्मद गौरी को फत्ह की खुशखबरी

जिस रोज हुजूर ख्वाजा गरीब नवाज र.अ. की जबाने मुबारक से यह जुमला (वाक्य) निकला ‘मैंने पृथ्वीराज को जिन्दा गिरफ्तार करके लश्करे इस्लाम के हवाले कर दिया।’ उसी रोज सुल्तान शहाबुद्दीन मुहम्मद गौरी को जो उन दिनों खुरासान में था, ख्वाब में बशारत हुई। देखता क्या है कि एक बा-खुदा बुजुर्ग सामने खड़े हैं और फरमा रहे हैं-‘ऐ शहाबुद्दीन ! खुदा-ए-तआला ने हिन्दुस्तान की सल्तनत तुझे अता फरमाई है, उठ, जल्द इस तरफ ध्यान दे और उस (घमंडी) राजा को जिन्दा गिरफ्तार करके सजा दे।’

यह कहकर वह बुजुर्ग रूपोश हो गए। बादशाह जब ख्वाब से बेदार हुआ (जागा) तो उसके दिल पर एक अजीब कैफियत थी और उसके कान में एक गैबी आवाज रह-रहकर आ रही थी, ‘उठ, हिन्दुस्तान चल, सफलता तेरा इन्तजार कर रही है।’ सुल्तान ने अपना ख्वाब आलिमों से बयान किया। सबने एक जबान होकर सुल्तान को मुबारकबाद दी और फत्ह की खुशखबरी सुनाई।