सरकार गरीब नवाज र.अ. का देहली का सफर

एक बार हजरत ख्वाज कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी र.अ. ने अजमेर शरीफ आने की इजाजत चाही। हजरत ख्वाज गरीब नवाज र.अ. ने इसके जवाब में लिखा कि-‘हर चाहने वाला अपने महबूब के साथ होता है, चाहे देखने में वह हजारों कोस दूर हो। इसलिए अच्छा यही है कि वहीं रहो, वहां तुम्हारी जरूरत है, कुछ दिन बाद हम खुद देहली आयेंगे।

इस जवाब के कुछ दिन बाद सरकार गरीब नवाज र.अ. देहली रवाना हुए। ख्वाजा कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी र.अ. ने आपके आने की खबर सुल्तान शम्सुद्दीन अलतमश को कराना चाही, मगर हुजूर गरीब नवाज र.अ. ने मना फरमा दिया। आपकी आमद की खबर देहली में कब छुपने वाली थी,

आखिरकार देहली वालों को मालूम हो ही गया और सभी आलिम, सुफी और खुद सुल्तान शम्सुद्दीन अलतमश आपकी खिदमत में हाजिर हुए। इन दिनों बाबा फरीदुद्दीन गंज शकर र.अ. इस कदर मेहनत से इबादत कर रहे थे कि जिस्म में खून की बूंद भी बाकी न थी, इसी कमजोरी की वजह से हुजूर गरीब नवाज र.अ. की खिदमत में हाजिर न हो सके। हुजूर गरीब नवाज र.अ. ने हजरत ख्वाजा बख्तियार काकी र.अ. से मालूम किया कि-‘तुम्हारे मुरीदों में से क्या कोई नेमत पाने से रह गया है ?’ कुतुब साहब ने अर्ज किया कि एक मुरीद रह गया है जो चिल्ले में बैठा है और वह मस्ऊद है यानी बाबा फरीदुद्दीन इस कदर कमजोर हो गये थे कि अदब के लिए खड़े भी न हो सके और उनकी आंखों से आंसू जारी हो गये। ख्वाजा साहब ने फरमाया-‘ऐ बाबा बख्तियार ! इस बेचारे को इबादत और तक्लीफों में कब तक घुलाते रहोगे, कुछ तो दो।’ कुतुब साहब ने अर्ज किया-‘हुजूर मैं आपके सामने क्या दे सकता हूं।’

हुजूर ख्वाज साहेब र.अ. उठे, बाबा फरीद र.अ. का एक बाजू खुद पकड़ा और ख्वाजा कुतुबुद्दीन र.अ. से फरमाया-‘दूसरा बाजू तुम पकड़ो।’ अब दोनों बुजुर्गों ने मिलकर क्या-क्या नेमतें बाबा फरीद को अता की, खुदा ही जानता है। बाबा फरीद र.अ. बड़े ही खुशनसीब थे कि उनको खुशकिस्मती से यह मौका मिला।

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