ख़्वाजा साहब र. अ. दोबारा पीर व मुर्शिद की खि़दमत में

रौज़ा-ए-अक़्दस से रुख़्सत (विदा) होकर ख़्वाजा ग़रीब नवाज र.अ. वापस बग़दाद शरीफ पहुंचे। उन दिनों आपके पीर व मुर्शिद हजरत ख़्वाजा उस्मान हारूनी र.अ. भी बग़दाद में मौजूद थे। आप उनकी खि़दमत में हाजि़र हुए और इर्शादे नबवी स.अ.व. से आपको आगाह किया। यह सुनकर आप बहुत खुश हुए और मुस्कराकर फरमाया-‘अब हम ऐतिकाफ में रहेगे और हुजरे से बाहर नही ओयेंगे।’

हज़रत ख़्वाजा ग़रीब नवाज र.अ. रोज़ाना सूरज निकलने के बाद अपने मुर्शिद की खि़दमत में हाजिर होते और रूहानी तालीम हासिल करते यह सिलसिला अठ्ठाईस रोज तक जारी रहा। इस दर्मियान में आपने जो कुछ अपने पीर व मुर्शिद की जबाने मुबारक से सुना उसे कलमबन्द कर लिया (लिख लिया)। इस तरह अठ्ठाईस रोज में अठ्ठाईस बाब (अध्याय) का एक रिसाला तैयार हुआ जिसका नाम ‘अनीसुल अरवाह’ रखा।

आखिरी रोज हजरत शेख़ ने ख़्वाजा साहब को अपना असा-ए-मुबारक, मुसल्ला और महान खिरका अता फरमाया।
बाद में वह तबर्रुकात मुस्तफवी स.अ.स. जो खानदाने चिश्त में सिलसिला-ब-सिलसिला चले आ रहे थे आपको सौंप कर फरमाया-‘लो, ये मेरी यादगार है, इनको इस तरह अपने पास रखना जिस तरह हमने रखा और तुम जिसको इस लायक समझो उसको सौंप देना। लायक फरज़न्द वहीं है जो अपने पीर के इर्शादात को अपने होश व गोश में जगह दे और उस पर अमल करना अपन मामूल बना ले। इस इर्शाद के बाद आपने अपने मुरीद हज़रत ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती र.अ. को रुख़्सत किया और खुद अल्लाह की याद में मग्न हो गये।

पीर व मुर्शिद से विदा होकर आप बग़दाद शरीफ से रवाना हुए और सफर के दौरान बदख़्शां, हिरात और सब्ज़वार भी गए। बल्ख से गुजरते हुए आपने वलीये कामिल बुजुर्ग शेख़ अहमद खिजरुया र.अ. की खानकाह मे कुछ रोज़ कि़याम फरमाया और फिर वहां से सफर का समान बांधा।

हज़रत ग़रीब नवाज़ र.अ. की आदत थी कि जब भी सफर करते अपने साथ तीर व कमान, चकमाक और नमकदान जरूर रखते ताकि सफर में किसी किस्म की तक्लीफ न हो। जब ज़्यादा भूख लगती तो जंगल से कोई परिन्दा शिकार करके गुज़र कर लेते। एक दिन आपको भूख ने ज्यादा परेशान किया तो आप शिकार की तलाश में निकले, सामने एक कुलन्ग नज़र आया। आपने जो तीर कमान से जोड़कर मारा तो वह जमीन पर आ रहा। आपने उसे जि़ब्ह करके ख़ादिम के हवाले किया ताकि भून ले और खुद नमाज़ पढ़ने मे लग गये।

जिस जगह आप नमाज पढ़ रहे थे उसके करीब ही एक मशहूर फल्सफी और हकीम का घर था। उनका मदरसा जारी था और दूर-दूर से तालिबे इल्म (विद्यार्थी), इल्म हासिल करने के लिए आते थे। उन हकीम साहब का नाम जियाउद्दीन था। उनको अपने फलसफा (यानी दर्शन शास्त्र ) पर बड़ा नाज़ था । और इसी वजह से औलिया अल्लाह का जि़क्र बड़े मजाक के अन्दाज में किया करते थे जिसका लोगों पर बुरा असर पड़ता था।

जहां ख़्वाजा साहब र.अ. नमाज पढ़ रहे थे और ख़ादिम कुलन्ग भून रहा था, हकीम जियाउद्दीन का वहां से गुज़र हुआ। उनकी नज़र जो ख़्वाजा साहब र.अ. पर पड़ी ता एकदम वहीं ठिठक कर रह गये। जब ख्वाजा साहब र.अ. नमाज से फारिग हुए तो उसने आपके रूए मुबारक में कुछ ऐसा जलवा देखा कि फल्सफा और हिकमत की तमाम बातें भूल गया और सलाम करके अदब से बैठ गया। इतने में ख़ादिम ने कुलन्ग भून कर ख़्वाजा साहब र.अ. की खिदमत में पेश किया। हुजूर ने उसकी एक टांग हकीम साहब को दी और दूसरी रान (गोश्त) खुद खाने लगे, बाकी ख़ादिम के हवाले कर दिया।

हकीम ने अभी पहला ही लुक्मा मुंह में डाला था कि बातिल (झूठ) का परदा चाक हो गया और हकीकत के आईने सामने आ गए, अक्ल व फल्सफे के सबब जो पूरे ख़्यालात उनके दिमाग में भरे हुए थे सब निकल गए, दिल पर ऐसी घबराहट पैदा हुई कि बेहोश हो गए, ख़्वाजा ने एक और लुक्मा उनके मुंह में डाल दिया। जैसे ही यह लुक्मा हल्क से नीचे उतरा बदहवासी कम हुई और होश में आ गये, अपने पिछले ख़्यालात पर बहुत शर्मिन्दा हुए और तौबा करके माफी मांगी। इसके बाद अपने सभी शागिर्दों के साथ हुजूर ग़रीब नवाज़ र.अ. के पैरों (मुरीद) हो गये।

जिस वक्त ख़्वाजा ग़रीब नवाज र.अ. का गुजर समरकन्द से हुआ तो आपने देखा के ख़्वाजा अबुल लैस समरकन्दी र.अ. के मकान के पास ही एक मस्जिद बन रही थी और एक होशियार आदमी कि़ब्ला की सिम्त (दिशा) पर ऐतराज कर रहा था। किसी तरह समझाये नहीं समझता था। आपने उसकी गरदन पकड़कर कहा-‘देख सामने क्या है।’ उसने क़ाबा शरीफ देख लिया और मान गया।

जब ख़्वाजा साहब र.अ. बदख़्शां में पहुंचे तो वहां इनकी मुलाकात एक बुजुर्ग से हुई, जिनकी उम्र एक सौ चालीस साल की थी। यह बुजुर्ग हज़रत जुनेद बग़दादी र.अ. की औलाद में से थे और उनका एक पैर कटा हुआ था। मालूम करने पर उन्होंने फरमाया कि काफी समय से एतिकाफ में रहकर इबादत में मशगूल था। एक दिन ख़्वाहिश ने मजबूर किया और इस पांव को जो कटा हुआ है आगे बढ़ाया ही था कि ग़ैब से आवाज आयी-‘ऐ मुद्दई ! यही वायदा था जो फरामोश कर दिया।’

बस इस आवाज़ को सुनना था कि ख़ौफ से बेकरार हो गया और उसी वक्त पांव काट कर फैंक दिया। इस घटना को चालीस साल गुज़र चुके हैं और यह बात दिल से निकलती नहीं है कि कल कि़यामत के दिन दुरवेशों के सामने क्या मुंह दिखाऊंगा।

इसके बाद हिरात में पहुंचकर ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ र.अ. हज़रत उबैदुल्लाह अन्सारी र.अ. के मज़ार मुबारक पर हाजिर हुए, मजार मुबारक पर अल्लाह तआला की हैबत तारी थी, इसलिए आप होशियार रहते थे। वहां आपने काफी समय इबादत में गुज़ारा। रात भर इबादत में लगे रहते और कई बार इशा की नमाज के वुजू से फज्र की नमाज अदा करते थे। जब हिरात में आपकी शोहरत बढ़ गयी और लोग आपकी खि़दमत में आने लगे तो आप वहां से रुख़्सत हुए ओर सीधे हिन्दुस्तान की तरफ चल पड़े।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *