फैसला कुन जंग

शहाबुद्दीन गौरी ने दुश्मन को गफलत में पाकर पूरा-पूरा फायदा उठाया और शाम से ही लश्कर बन्दी का हुक्म दे दिया। खेमों और ढेरों को उसी हालत में छोड़कर रातों रात कई मील का चक्कर काटकर पूरे लश्कर के साथ नदी से पार उतर गया। उस वक्त राजा को होश आया और उसके लश्कर में खलबली मच गयी। राजा ने होश हवास को कायम रखा और एक हिस्सा फौज को तुरन्त तैयार करके सामने ले आया फिर बाकी फौज को भी समेट कर मैदान में ला खड़ा किया।

राजा की फौज में तीन हजार हाथी, तीन लाख सवार और बेशुमार पैदल थे। उधर सुल्तान शहाबुद्दीन के पास सिर्फ एक लाख बीस हजार का लश्कर था। इसलिए राजा को अपनी कामियाबी का पूरा-पूरा यकीन था। इसलिए उसने लश्कर की तर्तीब पर कोई खास ध्यान नहीं दिया। सारी फौज को एक ही समय में हमले का हुक्म दे दिया। उधर सुल्तान ने तर्कीब से काम लेते हुए अपनी फौज के चार हिस्से किये और हर एक पर अलग-अलग सिपहसालार मुकर्रर करके बारी-बारी जाकर लड़ने का हुक्म दे दिया। राजपूत इस बहादुरी से लड़े कि सुल्तान की फौज के छक्के छूट गये। उस वक्त सुल्तान एक जंगी चाल चला यानी हार की सूरत बनाकर पीछें हटा, राजपूतों ने पीछा किया, सुल्तान ने जब यह देखा कि उनकी तर्तीब बिगड़ चुकी है, तो उसने दूसरे ताजा दम लश्कर को मैदान मे ला खड़ा किया लेकिन राजा की फौज बुशुमार थी, सुल्तान की चाल कारगर न हुई। लड़ते-लड़ते दोपहर का समय हो गया, सूरज सर पर आ गया, गर्मी का मौसम था और जंग थी के खत्म न होती थी। राजा पृथ्वीराज एक सौ पचास राजाओं को साथ लेकर लश्कर से निकाल और एक पेड़ के साये में पहुंचकर तय किया कि अब एक फैसलाकुन जंग लड़ी जाये। इस पर सबने तलवारों के कब्जे पर हाथ रखकर धर्म और देश पर कट मरने की कसम खाई, शरबत का एक-एक प्याला पिया, तुलसी की पत्ती जबान पर रखी और केसर का टीका अपने माथे पर लगाया और ताजा दम होकर मैदान में आ गये।

अब घमासान की लड़ाई शुरू हो गयी। राजा की फौज सुबह से लड़ते-लड़ते थक चुकी थी। सुल्तान मौका पाकर अपने बारह हजार तलवारबाज बहादुरों को लेकर जो इसके खास गुलाम थे और अब तक जंग में नहीं गये थे लश्कर से निकला और इस तेजी से हमला किया कि आन की आन में राजा की फौज के बीच में घुस गया। सुल्तान के दूसरे सरदारों को भी यह देखकर जोश आ गया और वह भी दायें-बायें जोर देकर राजा की फौज पर टूट पड़े। ताजा दम दस्ते का मुकाबला राजा की थकी हुई फौज के बस से बाहर था। देखते ही देखते हजारों राजपूत तलवार के घाटर उतर गये और राजा की फौज में हलचल मच गयी। उधर जंगी हाथी जिन पर राजा को बड़ा नाज था अपनी ही फौज पर उलट पड़े और हजारों को कुचल डाला। राजपूत सूरमाओं ने बड़ा संभाला लिया मगर उनके बनाए क्या बनता था। गरीब नवाज र.अ. का कौल (कथन) पूरा होना था और होकर रहा।

अभी थोड़ा दिन बाकी था कि राजा की फौज के पैर उखड़ गये और सुल्तान शहाबुद्दीन की फौज उन पर छा गयी। खांडे राव मैदाने जंग में मारा गया और बहुत से हिन्दुस्तान के राजा इस लड़ाई में काम आ गये, बाकी अपनी जान बचाकर भागने में कामियाब हो गये। पृथ्वीराज भी जान बचाकर भागना चाहता था मगर दरिया-ए-सरस्वती के किनारे गिरफ्तार कर लिया गया।

आखिरकार शहाबुद्दीन मुहम्मद गौरी की फतह हुई और इस जंग से उत्तरी हिन्दुस्तान पर मुसलमानों का कब्जा पूरी तरह से हो गया उसके बाद सरस्व्ती, सामाना, कोहराम और हांसी की राजपूत रियासतें आसानी से जीत ली गयीं। अब सुल्तान ने अजमेर का रुख किया। रास्तें में कोई बुकाबला नहीं हुआ बल्कि मरे हुए राजाओं के बेटों ने सुल्तान का शानदार इस्तकबाल (स्वागत) किया और उसकी शरण में आ गये। सुत्तान ने अजमेर पहुंचकर यहां की हुकूमत पृथ्वीराज के एक बेटे कोला को दी और उससे वफादारी का हलफ लिया।

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