इबादत व रियाजत

आपका ज्यादातर वक्त इबादत और अल्लाह की याद में गुजरता था। कुरआन शरीफ पढ़ना आपको बहुत पसन्द था। एक दिन में दो-दो बार कुरआन शरीफ खत्म कर लिया करते थे। अक्सर (अधिकतर) सुबह के वुजू से इशा की नमाज पढ़ते थे। नमाज और रोजे के बड़े पाबन्द थे। रात का ज्यादा हिस्सा पढ़ने में गुजरता थ, अक्सर व बेशतर रातों में इर्शा के वुजू से आपने फज्र की नमाज अदा फरमाई। सारी उम्र में बहुत कम ऐसा हुआ है कि जिसमें आप रोजे से न रहे हों। अक्सर आप लगातार एक-एक हफ्ते तक रोजा रखते थे और जौ की सूखी रोटी से जो वजन में पांच मिसकला से ज्यादा न होती थी इफ्तार (रोजा खोलना) किया करते थे लेकिन आंखों की तासीर का यह आलम था कि आपकी नजर जिस गुनाहगार पर पड़ती वह आपसे अकीदत (श्रद्धा) रखने लगता और फिर कभी गुनाह के पास न जाता।

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