सफ़र और बुज़ुर्गों से मुलाक़ातें

ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ र.अ. ने पीर व मुर्शिद हज़रत ख़्वाजा उस्मान हारूनी र.अ. से इजाज़ हासिल करके बग़दाद का रुख़ किया। रास्तें मे कई जगहों पर ठहरते हुए खि़रक़ान पहुंचे। खि़रक़ान उस ज़माने में एक छोटा-सा क़स्बा था मगर उसकी शोहरत शेख़ अबुल हसन खि़रक़ानी र.अ. की वजह से थी। ख़्वाजा साहब ने आपकी ज़ात से बातनी फ़ैज़ (आंतरिक शांति) हासिल किया। कुछ दिन खि़रक़ान में कि़याम फ़रमाने के बाद आप वहां से आगे बढ़े। रास्तें में जहां कोई ख़ुदा रसीदा बुज़ुर्ग का मज़ार मिला आपने कि़याम फ़रमाया और बातनी फ़ैज़ हासिल किया।

माजि़न्दान की सरहद के क़रीब इस्तराबाद एक मशहूर और अच्छा शहर था। जिस वक़्त आप वहां पहुंचे, शेख़ नासिरुद्दीन र.अ. वहां कि़याम पज़ीर (ठहरे) थे। वह एक बुलन्द मर्तबा और ख़ुदा रसीदा बुज़ुर्ग थे। उनका सिलसिला सिर्फ़ दो वास्तों से हज़रत शेख़ बायज़ीद बुस्तामी र.अ. से मिलता था। हज़रत ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ र.अ. काफी दिन तक उनकी खि़दमत में रहकर नूरे इरफान हासिल करते रहे। वहां से रवाना होकर इस्फ़ाहान चले गये। उस वक़्त इस्फ़ाहान दुनिया के ख़ूबसूरत और मशहूर शहरों में गिना जाता था। उन्हीं दिनों इस्फ़ाहान में शेख महमूद इस्फ़ाहानी तशरीफ़ फ़रमा थे। हमारे ख़्वाजा ने आपसे मुलाकात की। यह मुलाकात भी अजीब व ग़रीब थी।
दो मरदाने हक़ आमने-सामने खड़े थे और दो जानिब से नूर की बारिश हो रही थी।

कुदरत का करिश्मा तो देखिये कि उसी ज़माने में हज़रत ख़्वाजा कुतुबुद्दीन बखि़्तयार काकी र.अ. मुर्शिद कामील की तलाश में सफ़र करते हुए इधर आ निकले और इस्फ़ाहान र.अ. की खि़दमत में हाजि़र होते रहते थे, क्योंकि आप उनसे बहुत अक़ीदत (श्रद्धा) रखते थे, इसलिए आपसे बैअत करना चाहते थे मगर कुदरत को कुछ और ही मन्जूर था। एक दिन आपकी नज़र हज़रत ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती र.अ. पर पड़ गयी जिससे नूरानी किरणें निकल रही थी। बस फिर क्या था, आप हज़रत ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती र.अ. की खि़दमत में हाजि़र होने के लिए बेक़रार हो गये और एक दिन हुज़ूर ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ र.अ. की खि़दमत में हाजि़र हो गये, और आपके दस्ते हक़ परस्त पर बैत करके इरादतमन्दों में शामिल हो गये।

हज़रत ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ र.अ. इस्फ़ाहान से कूच फ़रमाकर हमदान पहुंचे। वहां उस वक़्त के सबसे बड़े और ज़बरदस्त आलिम शेख यूसुफ़ हमदानी र.अ. से मुलाक़ात करके फ़ैज़ व बरकत हासिल किया।
हमदान सेरवाना होकर आप तबिरेज पहुंचे। उन दिनों में हजरत शेख अबू सई तबरेजी र.अ. की बहुत शोहरत थी। कुछ दिन वहां रहकर उनकी पाक सोहबत (संगत) से दिली सुकून हासिल करते रहे। बाद में आप बगदाद तशरीफ ले गये।

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