ख़्वाजा साहब र.अ. रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के दरबार में

मक्का मुअज्जमा से रवाना होकर हज़रत ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ र.अ. मदीना मुनव्वरा आये और बड़ी आजिज़ी से दरबार रसूलुल्लाह में हाजिरी दी। रोजाना मस्जिदे नबवी में पांचों वक्त की नमाज पढ़ते और ज़्यादातर वक्त रौज़ा-ए-अक़्दस के करीब हाजि़र रहकर दरूद व सलाम पेश करते रहते। एक दिन वक़्त नमाजे फज्र पढ़ने के बाद पूरी मस्जिदे नबवी के नमाजी रोज़ा-ए-अक़्दस के करीब दरूद व सलाम पढ़ कर अदब व एहतराम से रुख़्सत होते जा रहे थे कि अचानक आवाज़ आई-‘मुईनुद्दीन को बुलाओ।’

रौज़ा-ए-मुबारक के शेख़ ने मस्जिद के मेहराब में खड़े होकर आवाज़ दी-‘मुईनुद्दीन हाजि़र हो।’

इस मजमे में जितने भी मुईनुद्दीन नाम के शख़्स मौजूद थे, शेख़ की आवाज पर लब्बैक-लब्बैक कहते हुए हाजि़र हो गये।
अब शेख़ हैरान हैं कि किस मुईनुद्दीन को सरकार ने बुलाया है। मालूम करने पर हुजूर स.अ.व. ने फरमाया-‘मुईनुद्दीन चिश्ती को हाजि़र करो।’

ख़्वाजा मुईनुद्दीन लब्बैक-लब्बैक कहते हुए शेख़ के क़रीब पहुंच गये। शेख़ ने आपको रौज़ा-ए-अक़्दस तक पहुंचा दिया
और अर्ज किया-`या रसूलल्लाह ! मुईनुद्दीन चिश्ती हाजि़र है।`

रोज़ा-ए-अक़्दस का दरवाज़ा अपने आप खुल गया और इर्शादे नबवी स.अ.व. हुआ-‘ऐ कुतुबुल मशाइख़ अन्दर आओ।’

हुजूर ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ र.अ. वजदानी हालत में रोज़ा-ए-अक़्दस के अन्दर दाखिल हुए और तजल्लियाते नबवी में बेखुद व सरशार हो गये। जब दिली सुकून हासिल हुआ तो हुक्म हुआ-‘ऐ मुईनुद्दीन ! तू हमारे दीन का मुईन (मददगार) है। हमने हिन्द की खि़लाफत तुझे अता की। हिन्दुस्तान जा और अजमेर में कियाम कर, वहीं से तब्लीगे इस्लाम करना।

ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ र.अ. बड़े अदब व एहतराम से रौज़ा-ए-अक़्दस से बाहर निकले। आप पर एक खास कैफियत तारी थी। जब इस हालत से बेदार हुए और दिली सुकूलन मिल गया तो आपको फरमाने रिसालत याद आया, मगर हैरान थे कि हिन्दुस्तान किधर है और अजमेर कहां है ? इसी फिक्र में थे कि शाम हो गई और सूरज डूब गया। इशा की नमाज के बाद आंख लगी और आप सो गये। ख़्वाब की हालत में हिन्दुस्तान का नक्शा और अजमेर का मन्जर आपके सामने था। जब नींद से आंख खुली तो सज़्दा-ए-शुक्र अदा किया और रौज़ा-ए-अक़्दस पर हाजिर होकर तोहफा-ए-दरूद व सलाम पेश करके हिन्दुस्तान की जानिब रवाना हुए।

हुजूर ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ र.अ. अपने सफर के दौरान मुल्क शाम भी गये, मगर यह पता नहीं है कि आप वापसी में शाम गये या जाती दफा इधर से गुज़रे।

ख़्वाज़ा ग़रीब नवाज़ र.अ. इस सफर का हाल खुद बयान फरमाते हैं-

एक बार मैं एक शहर में पहुंचा जो शाम के पास है वहां एक बजुर्ग एक गार (गुफा) में रहा करते थे। उनके बदन का गोश्त (मांस) सूख गया था, सिर्फ हड्डियां बाकी थीं। यह बुजुर्ग एक मोटे कपड़े पर बैठे हुए थे और दो शेर दरवाजे पर खड़े थे। मैं उनकी मुलाकात को गया, मगर उन शेरों की वजह से अन्दर जाने की हिम्मत न हुई। शेख़ ने मुझे देखकर फरमाया-‘चले आओ, डरो नहीं।’

यह सुनकर मैं अन्दर चला गया और अदब से बैठ गया। कहने लगे, जब तक किसी चीज का इरादा न करोगे वह भी
तुम्हारा इरादा न करेगी। फिर फरमाया-‘जिसके दिल में ख़ौफे खुदा होता है, हर चीज़ उससे डरती है।

फिर मुझसे पूछा-‘कहां से आना हुआ ?’ ‘अर्ज किया, बग़दाद से’, कहने लगे-‘खुश आमदीद, लेकिन
अच्छा यह है कि दुवेशों की खि़दमत करते रहो, ताकि तुम्हारे अन्दर भी दुरवेशों का जौक पैदा हो।’

फिर फरमाया-‘मुझे कई साल इस गुफा में रहते गुजर गये, एक बात से डरता हूं।’ मैंने पूछा वह क्या बात है।

उन्होंने कहा-‘नमाज़ है जिसके अदा करने के बाद इस ख़ौफ से कि कोई भूल-चूक न रह गयी हो और नमाज़ ही मेरे
लिए इताब (अल्लाह की पकड़) हो जाए, रोता हूं। बस ऐ दुरवेश ! अगर नमाज़ अदा की तो सुब्हान अल्लाह वरना मुफ्त में उम्र बेकार हुई।’

इसके बाद कहने लगे-‘नाम को नियम से पूरा न करना, इससे ज्यादा कोई गुनाह नहीं। मुझे मालूम नहीं कि मेरी नमाज़
खुदा-ए-तआला ने कुबूल फरमाई या नहीं।’

फिर मुझे एक सेब दिया और फरमाया-‘कोशिश करो कि हक्के नमाज़ अदा हो जाए वरना कल कि़यामत के दिन शर्मिन्दगी होगी।

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