ख़्वाजा साहब र.अ अल्लाह के दरबार में

हज़रत ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ र.अ. 583 हिज़री में मक्का शरीफ पहुंचे और खाना-ए-काबा की जि़यारत की। अक्सर (अधिकतर) काबा शरीफ का तवाफ करते और इबादत में मशगूल रहते। आपने वहां बेशुमार बरकतें हासिल की। एक दिन का वाकिया है कि हज़रत ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ र.अ. ख़ाना-ए-क़ाबा में इबादत में मशगूल थे, ग़ैब से आवाज आई ‘ऐ मुईनुद्दीन!
मैं तुझसे राजी हूं, तुझे बख़्श दिया। जो कुछ तेरा दिल चाहे मांग ले।’

ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ र.अ. यह सुनकर बहुत खुश हुए और बेखुद होकर सज़्दे में गिर पड़े। आपने बारगाहे इलाही में बहुत आजिज़ी से अर्ज किया-‘खुदा वन्दा । जो मेरे सिलसिले में मुरीद हों उनको बख्श दे।’ उसी वक्त आवाज आई।

‘ऐ मुईनुद्दीन ! तेरी दुआ मकबूल है और कियामत तक तेरे सिलसिले में जो दाखिल होगा उसे बख्श दूंगा।

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