ख़्वाजा साहब र.अ. पीरे कामील की खि़दमत में

क़स्बा हारून एक छोटा-सा क़स्बा था लेकिन शाने ख़ुदावन्दी तो देखो कि इस छोटे से क़स्बे पर अल्लाह की रहमत बरस रही थी, यानी इन दिनों वहां हज़रत ख़्वाजा शेख़ उस्मान हारूनी र.अ.जल्वा अफ़रोज़ थे और उनकी वजह से तमाम क़स्बा ख़ैर व बरकत से मामूर (भरा) था। हज़रत शेख़ उस्मान हारूनी र.अ. महान औलियाओं में से थे और आपके फ़ैज़ व बरकत की चर्चा दूर-दूर तक फैली हुई थी, हाजतमन्द और अल्लाह के चाहने वाले अपनी मुरादों की झोलियां भर-भरकर ले जाते थे।

हुज़ूर ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ र.अ. के इश्क़ का जज़्बा आखि़रकार आपको मंजि़ल पर ले आया, यानी आप क़स्बा-ए-
हारून में दाखि़ल हो गये। उस वक़्त आपकी ख़ुशी की इन्तिहा न रही क्योंकि आपने अब चश्मा-ए-आबे बक़ा को पा लिया था यानी पीरे कामिल को पा लिया था।

हमारे ख़्वाजा र.अ. दूर से सफ़र करते हुए हारून पहुंचे थे इसलिए आपका जिस्म मुबारक गर्द आलूद (धूल युक्त) हो गया था और लिबास गुबार में अटा हुआ था। आप बेक़रार ज़रूर थे मगर चेहरे पर ताज़गी और संजीदगी (गंभीरता) दिखाई देती थी। हज़रत ग़रीब नवाज़ र.अ. ने हज़रत ख़्वाजा शेख़ उस्मान हारूनी र.अ. के दस्ते हक़ परस्त पर बैअत की और ख़्वाजा उस्मान हारूनी र.अ. ने आपको अपने शागिर्दों में शामिल कर लिया।

हज़रत ख्वाजा गरीब नवाज़ र. अ. के मुरीद होने का वाकिया खुद आपके शब्दों में यहाँ पेश किया जाता हे !

में एक इसी सोहबत में जिसमें जलीलुल क़द्र बुजुर्ग मौजूद थे बहुत अदब से हाजि़र हुआ और सरे नियाज़ ज़मीने अदब पर झुका दिया।

हुज़ूर ने हुक्म फ़रमाया-

‘दो रक्अत नमाज़ अदा करो।’

मैंने हुक्म का पालन किया, फिर हुक्म हुआ।

‘कि़बला रुख़ बैठ जाओं।’

मैं अदब से कि़बला रुख़ बैठ गया।

फिर इर्शाद फ़रमाया-‘सूरः बक़रः की तिलावत करो।’

मैंने अदब के साथ तिलावत की, फिर हुक्म हुआ-‘साठ बार सुब्हाल्लाह पढ़ो।’ मैंने पढ़ा। फिर हुज़ूरे वाला ने मेरा हाथ अपने हाथ में लिया और आसमान की तरफ़ नज़र उठाकर देखा और ज़बान मुबाकर से यह इर्शाद फ़रमाया-‘मैंने तुझे ख़ुदा तक पहुंचा दिया।’

इन सभी बातों के बाद हज़रत शेख़ उस्मान हारूनी र.अ. ने एक ख़ास कि़स्म की तुर्की टोपी मेरे सर पर रखी जो कुलाह चहार तुर्की कहलाती है और जुब्बा (चोग़ा) मुबारक मुझे पहनाया। फिर फ़रमाया-बैठ जाओ।’
मैं फ़ौरन बैठ गया। अब फिर हुक्म हुआ।

‘हज़ार बार सूरः इख़्लास पढ़ो।’

जब मैं इससे फ़ारिग़ हुआ तो फ़रमाया-‘हमारे मशाइख़ के यहां सिर्फ़ एक दिन रात की इबादत है, इसलिए जाओ और एक दिन रात बराबर इबादत करो।

ये हुक्म सुनकर मैंने एक दिन रात पूरी इबादतें इलाही और नमाज़ में गुज़ार दी। दूसरे दिन खि़दमत में हाजि़र होकर
क़दम-बोसी की दौलत हासिल की ओर हुक्म के मुताबिक बैठ गया। इर्शाद फ़रमाया-‘इधर देखो।’ (आसमान की तरफ़ इशारा करके) मैंने आसमान की तरफ़ नज़र उठाई। आपने पूछा-‘कहां तक दिखता है ?’
मैंने जवाब दिया, ‘अर्शे मोअल्ला तक।’

फिर इर्शाद हुआ, ‘नीचे देखो।’ ?

मैंने नीचे देखा तो फिर वही फ़रमाया-‘कहां तक दिखता है?

मैंने जवाब दिया, ‘तहतुस्सरा (पाताल) तक।’

फिर हुक्म हुआ-‘हज़ार बार सूरः इख़लास पढ़ों’

मैंने हुक्म का पालन किया तो हज़रत ने फिर फिर इर्शाद फ़रमाया-‘आसमान की तरफ़ देखो।’

मैंने देखा और अजऱ् किया-‘हिजाबे अज़मत तक साफ़ नज़र आ रहा है।’
फ़रमाया-‘आंखें बन्द करों’ मैंने आंखें बन्द कर ली। फिर हुक्म दिया-‘खोल दो’

मैंने आंखें खोल दीं।

इसके बाद आपने अपनी दो उंगलियां मेरे सामने की और पूछा-‘क्या दिखाई देता है। ?’

मैंने जवाब दिया-‘अट्ठारह हज़ार आलम मेरी आंखों के सामने है।’

जब मेरी ज़बान से ये जुम्ले (वाक्य) निकले तो आपने इर्शाद फ़रमाया-‘बस, अब तेरा काम पूरा हो गया।’

बाद में एक ईंट की तरफ़ , जो सामने पड़ी थी, इशारा करके फ़रमाया-‘इसकेा उठा लो।’

मैंने उठाया तो उसके नीचे से कुछ दीनार निकले, जिनके बारे में हुक्म हुआ-‘इन्हें ले जा, और फक़ीरों व ग़रीबों में बांट दे।’
मैंने हुक्म का पालन किया और फिर खि़दमत में हाजि़र हुआ।

इर्शाद हुआ-‘कुछ दिन हमारी खि़दमत में रहो।’

मैंने अजऱ् किया-‘हाजि़र हूं।

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