खिदमत-ए-खलक (जन-सेवा)

खिदमत-ए-खलक (जन-सेवा) एक रोज एक किसान आपकी खिदमत में हाजिर हुआ, अर्ज किया कि हाकिम ने मेरा खेत जब्त कर लिया है और कहता है। कि जब तक फरमाने शाही पेश नहीं करोगे खेत वापस नहीं मिलेंगे। सिर्फ यही मेरा गुजर-बसर का जरिया था जिसको हाकिम ने बन्द कर दिया है इसलिए मेरी मदद करें और कुतुब साहब को एक सिफारशी खत लिखकर दिया जाए। कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी र.अ. सुल्तान शम्सुद्दीन अलतमश के पीर हैं और जो कुछ इर्शाद फरमायेंगे बादशाह उसे कुबूल कर लेगा।

हजरत ख्वाजा गरीब नवाज र.अ. ने यह सुनकर मुराकबे में सर झुका दिया और थोड़ी देर बाद सर उठाकर कहा-‘अगरचे मेरी सिफारिश से तेरा काम हो जायेगा लेकिन हक तआला ने मुझे तेरे इस काम के लिए मुकर्रर किया है और उसी वक्त किसान को साथ लेकर देहली रवाना हो गये।

हुजूर ख्वाजा गरीब नवाज र.अ. हमेशा अपनी आमद से पहले ख्वाजा कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी र.अ. को आगाह कर दिया करते थे। इस बार आपने कोई इत्तिला (सूचना) नहीं दी। आप जब देहली के करीब पहुंचे तो एक शख्स ने आपको पहचान लिया और तुरन्त कुतुब साहब को खबर कर दी। कुतुब साहब ने बादशाह को सूचित किया और खुद पीर व मुर्शीद के स्वागत के लिए चल दिये।

ख्वाजा कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी र.अ. परेशान थे कि इस बार पीर व मुर्शिद ने अपनी आमद की खबर क्यों नहीं दी। मौका पाते ही ख्वाजा गरीब नवाज र.अ. से बगैर इत्तिला आने की वजह मालूम की। सरकार गरीब नवाज र.अ. ने किसान की तरफ इशारा करके फरमाया-‘इस गरीब के काम के लिए आया हूं।’ और कुल हाल बयान कर दिया। कुतुब साहब ने अर्ज किया-‘आपने इस कदर लकलीफ उठाई, हालांकि अगर आपका खादिम भी बादशाह से फरमाने आली कह देता तो शख्स की मुराद पूरी हो जाती।

ख्वाजा गरीब नवाज र.अ. ने फरमाया-‘जिस वक्त यह शख्स मेरे पास आया बहुत गमगीन और मायूस था। मैंने ध्यान मग्न होकर दरबारे खुदावन्दी में अर्ज किया तो मुझे हुक्म हुआ कि इसके रंज व गम में शरीक होना इबादत के बराबर है। अगर मैं बजाये चलकर आने के वहीं से इस शख्स की सिफारिश लिख देता तो उस सवाबे अजीम से महरूम रहता जो हर कदम पर उसकी खुशी से मुझे हासिल हुआ है।’ कुतुब साहब ने अर्ज किया-‘हुजूर आराम फरमायें और खुद सुल्तान शम्सुद्दीन अलतमश से किसान के हक में फरमान हासिल करके खिदमते आली में पेश कर दिया।

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