मनक़बत

हिन्द में घर-घर नसब मिल्लत का झन्डा कर दिया।

सफ़हा-ए-दुनिया पे दीं का बोलबाला कर दिया।

इश्क़े नामे मुस्तफ़ा हर दिल में पैदा कर दिया।

दैर का रुख़्ा जानिबे मेहराबे काबा कर दिया।।

मोतियों से दामने मक़सूद सबने भर लिए।

एक ज़मीने ख़्ाुश्क को पल भर में दरिया कर दिया।।

खूब फैलाइ जि़या शम्सुददुहा के नूर की।

मिल्लते रोशन से दुनिया में उजाला कर दिया।।

आपके फ़ैज़े क़दम से उठ गर्इ सब छूत-छात।

आपके इकराम ने अदना को आला कर दिया।।

कर दिया तौहीद के रिश्ते में सबको मुनसलिक।

हक़ के सब बिछड़े हुए बन्दों को यकजा कर दिया।।

हम से जो लाखों करोड़ों से न अब तक हो सका।

हल वो एक अल्लाह वाले ने मुअम्मा कर दिया।।

देखिये क्यों कर किया क़ब्ज़ा दिलों पर ख़्ाल्क के।

देखिये ख़्वाजा मुर्इनुíीं ने क्या क्या कर दिया।।

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