लंगर खाने का दरोगा गरीब नवाज़ के मुस्सल्ले के दामन से जितना चाहे उतना माल ले लेता

हजरत ख्वाजा गरीब नवाज र.अ. ने उस हालत में जबकि आपकी आमदनी का कोई जरिया नहीं था लंगरखाना जारी किया और आपके लंगरखाने में इस कदर ज्यादा खाना पकता था कि सभी शहर के गरीब व लाचार पेट भरकर खाते-पीते थे। कहा जाता है कि लंगरखाने के दारोगा को आपने हुक्म दे रखा था कि जब और जिस कदर खर्च की जरूरत हो मांग लिया करे। रोजाना सुबह के वक्त जब दारोगा उस गरज से हाजिर होता तो आप अपने मुसल्ले का दामन उठाकर उससे फरमाते हैं कि जिस कदर खर्च की जरूरत हो इस खजाने गैब से ले लो। खुद रोज रखते और जौ की सूखी रोटी से जो वजन में किसी हालत में पांच मिसकाल से ज्यादा नहीं होती थी, रोजा खोलते थे।

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