ख़्वाजा साहब र. अ. दोबारा पीर व मुर्शिद की खि़दमत में

रौज़ा-ए-अक़्दस से रुख़्सत (विदा) होकर ख़्वाजा ग़रीब नवाज र.अ. वापस बग़दाद शरीफ पहुंचे। उन दिनों आपके पीर व मुर्शिद हजरत ख़्वाजा उस्मान हारूनी र.अ. भी बग़दाद में मौजूद थे। आप उनकी खि़दमत में हाजि़र हुए और इर्शादे नबवी स.अ.व. से आपको आगाह किया। यह सुनकर आप बहुत खुश हुए और मुस्कराकर फरमाया-‘अब हम ऐतिकाफ में रहेगे और हुजरे से बाहर नही ओयेंगे।’

हज़रत ख़्वाजा ग़रीब नवाज र.अ. रोज़ाना सूरज निकलने के बाद अपने मुर्शिद की खि़दमत में हाजिर होते और रूहानी तालीम हासिल करते यह सिलसिला अठ्ठाईस रोज तक जारी रहा। इस दर्मियान में आपने जो कुछ अपने पीर व मुर्शिद की जबाने मुबारक से सुना उसे कलमबन्द कर लिया (लिख लिया)। इस तरह अठ्ठाईस रोज में अठ्ठाईस बाब (अध्याय) का एक रिसाला तैयार हुआ जिसका नाम ‘अनीसुल अरवाह’ रखा।

आखिरी रोज हजरत शेख़ ने ख़्वाजा साहब को अपना असा-ए-मुबारक, मुसल्ला और महान खिरका अता फरमाया।
बाद में वह तबर्रुकात मुस्तफवी स.अ.स. जो खानदाने चिश्त में सिलसिला-ब-सिलसिला चले आ रहे थे आपको सौंप कर फरमाया-‘लो, ये मेरी यादगार है, इनको इस तरह अपने पास रखना जिस तरह हमने रखा और तुम जिसको इस लायक समझो उसको सौंप देना। लायक फरज़न्द वहीं है जो अपने पीर के इर्शादात को अपने होश व गोश में जगह दे और उस पर अमल करना अपन मामूल बना ले। इस इर्शाद के बाद आपने अपने मुरीद हज़रत ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती र.अ. को रुख़्सत किया और खुद अल्लाह की याद में मग्न हो गये।

पीर व मुर्शिद से विदा होकर आप बग़दाद शरीफ से रवाना हुए और सफर के दौरान बदख़्शां, हिरात और सब्ज़वार भी गए। बल्ख से गुजरते हुए आपने वलीये कामिल बुजुर्ग शेख़ अहमद खिजरुया र.अ. की खानकाह मे कुछ रोज़ कि़याम फरमाया और फिर वहां से सफर का समान बांधा।

हज़रत ग़रीब नवाज़ र.अ. की आदत थी कि जब भी सफर करते अपने साथ तीर व कमान, चकमाक और नमकदान जरूर रखते ताकि सफर में किसी किस्म की तक्लीफ न हो। जब ज़्यादा भूख लगती तो जंगल से कोई परिन्दा शिकार करके गुज़र कर लेते। एक दिन आपको भूख ने ज्यादा परेशान किया तो आप शिकार की तलाश में निकले, सामने एक कुलन्ग नज़र आया। आपने जो तीर कमान से जोड़कर मारा तो वह जमीन पर आ रहा। आपने उसे जि़ब्ह करके ख़ादिम के हवाले किया ताकि भून ले और खुद नमाज़ पढ़ने मे लग गये।

जिस जगह आप नमाज पढ़ रहे थे उसके करीब ही एक मशहूर फल्सफी और हकीम का घर था। उनका मदरसा जारी था और दूर-दूर से तालिबे इल्म (विद्यार्थी), इल्म हासिल करने के लिए आते थे। उन हकीम साहब का नाम जियाउद्दीन था। उनको अपने फलसफा (यानी दर्शन शास्त्र ) पर बड़ा नाज़ था । और इसी वजह से औलिया अल्लाह का जि़क्र बड़े मजाक के अन्दाज में किया करते थे जिसका लोगों पर बुरा असर पड़ता था।

जहां ख़्वाजा साहब र.अ. नमाज पढ़ रहे थे और ख़ादिम कुलन्ग भून रहा था, हकीम जियाउद्दीन का वहां से गुज़र हुआ। उनकी नज़र जो ख़्वाजा साहब र.अ. पर पड़ी ता एकदम वहीं ठिठक कर रह गये। जब ख्वाजा साहब र.अ. नमाज से फारिग हुए तो उसने आपके रूए मुबारक में कुछ ऐसा जलवा देखा कि फल्सफा और हिकमत की तमाम बातें भूल गया और सलाम करके अदब से बैठ गया। इतने में ख़ादिम ने कुलन्ग भून कर ख़्वाजा साहब र.अ. की खिदमत में पेश किया। हुजूर ने उसकी एक टांग हकीम साहब को दी और दूसरी रान (गोश्त) खुद खाने लगे, बाकी ख़ादिम के हवाले कर दिया।

हकीम ने अभी पहला ही लुक्मा मुंह में डाला था कि बातिल (झूठ) का परदा चाक हो गया और हकीकत के आईने सामने आ गए, अक्ल व फल्सफे के सबब जो पूरे ख़्यालात उनके दिमाग में भरे हुए थे सब निकल गए, दिल पर ऐसी घबराहट पैदा हुई कि बेहोश हो गए, ख़्वाजा ने एक और लुक्मा उनके मुंह में डाल दिया। जैसे ही यह लुक्मा हल्क से नीचे उतरा बदहवासी कम हुई और होश में आ गये, अपने पिछले ख़्यालात पर बहुत शर्मिन्दा हुए और तौबा करके माफी मांगी। इसके बाद अपने सभी शागिर्दों के साथ हुजूर ग़रीब नवाज़ र.अ. के पैरों (मुरीद) हो गये।

जिस वक्त ख़्वाजा ग़रीब नवाज र.अ. का गुजर समरकन्द से हुआ तो आपने देखा के ख़्वाजा अबुल लैस समरकन्दी र.अ. के मकान के पास ही एक मस्जिद बन रही थी और एक होशियार आदमी कि़ब्ला की सिम्त (दिशा) पर ऐतराज कर रहा था। किसी तरह समझाये नहीं समझता था। आपने उसकी गरदन पकड़कर कहा-‘देख सामने क्या है।’ उसने क़ाबा शरीफ देख लिया और मान गया।

जब ख़्वाजा साहब र.अ. बदख़्शां में पहुंचे तो वहां इनकी मुलाकात एक बुजुर्ग से हुई, जिनकी उम्र एक सौ चालीस साल की थी। यह बुजुर्ग हज़रत जुनेद बग़दादी र.अ. की औलाद में से थे और उनका एक पैर कटा हुआ था। मालूम करने पर उन्होंने फरमाया कि काफी समय से एतिकाफ में रहकर इबादत में मशगूल था। एक दिन ख़्वाहिश ने मजबूर किया और इस पांव को जो कटा हुआ है आगे बढ़ाया ही था कि ग़ैब से आवाज आयी-‘ऐ मुद्दई ! यही वायदा था जो फरामोश कर दिया।’

बस इस आवाज़ को सुनना था कि ख़ौफ से बेकरार हो गया और उसी वक्त पांव काट कर फैंक दिया। इस घटना को चालीस साल गुज़र चुके हैं और यह बात दिल से निकलती नहीं है कि कल कि़यामत के दिन दुरवेशों के सामने क्या मुंह दिखाऊंगा।

इसके बाद हिरात में पहुंचकर ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ र.अ. हज़रत उबैदुल्लाह अन्सारी र.अ. के मज़ार मुबारक पर हाजिर हुए, मजार मुबारक पर अल्लाह तआला की हैबत तारी थी, इसलिए आप होशियार रहते थे। वहां आपने काफी समय इबादत में गुज़ारा। रात भर इबादत में लगे रहते और कई बार इशा की नमाज के वुजू से फज्र की नमाज अदा करते थे। जब हिरात में आपकी शोहरत बढ़ गयी और लोग आपकी खि़दमत में आने लगे तो आप वहां से रुख़्सत हुए ओर सीधे हिन्दुस्तान की तरफ चल पड़े।

ख़्वाजा साहब र.अ. रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के दरबार में

मक्का मुअज्जमा से रवाना होकर हज़रत ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ र.अ. मदीना मुनव्वरा आये और बड़ी आजिज़ी से दरबार रसूलुल्लाह में हाजिरी दी। रोजाना मस्जिदे नबवी में पांचों वक्त की नमाज पढ़ते और ज़्यादातर वक्त रौज़ा-ए-अक़्दस के करीब हाजि़र रहकर दरूद व सलाम पेश करते रहते। एक दिन वक़्त नमाजे फज्र पढ़ने के बाद पूरी मस्जिदे नबवी के नमाजी रोज़ा-ए-अक़्दस के करीब दरूद व सलाम पढ़ कर अदब व एहतराम से रुख़्सत होते जा रहे थे कि अचानक आवाज़ आई-‘मुईनुद्दीन को बुलाओ।’

रौज़ा-ए-मुबारक के शेख़ ने मस्जिद के मेहराब में खड़े होकर आवाज़ दी-‘मुईनुद्दीन हाजि़र हो।’

इस मजमे में जितने भी मुईनुद्दीन नाम के शख़्स मौजूद थे, शेख़ की आवाज पर लब्बैक-लब्बैक कहते हुए हाजि़र हो गये।
अब शेख़ हैरान हैं कि किस मुईनुद्दीन को सरकार ने बुलाया है। मालूम करने पर हुजूर स.अ.व. ने फरमाया-‘मुईनुद्दीन चिश्ती को हाजि़र करो।’

ख़्वाजा मुईनुद्दीन लब्बैक-लब्बैक कहते हुए शेख़ के क़रीब पहुंच गये। शेख़ ने आपको रौज़ा-ए-अक़्दस तक पहुंचा दिया
और अर्ज किया-`या रसूलल्लाह ! मुईनुद्दीन चिश्ती हाजि़र है।`

रोज़ा-ए-अक़्दस का दरवाज़ा अपने आप खुल गया और इर्शादे नबवी स.अ.व. हुआ-‘ऐ कुतुबुल मशाइख़ अन्दर आओ।’

हुजूर ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ र.अ. वजदानी हालत में रोज़ा-ए-अक़्दस के अन्दर दाखिल हुए और तजल्लियाते नबवी में बेखुद व सरशार हो गये। जब दिली सुकून हासिल हुआ तो हुक्म हुआ-‘ऐ मुईनुद्दीन ! तू हमारे दीन का मुईन (मददगार) है। हमने हिन्द की खि़लाफत तुझे अता की। हिन्दुस्तान जा और अजमेर में कियाम कर, वहीं से तब्लीगे इस्लाम करना।

ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ र.अ. बड़े अदब व एहतराम से रौज़ा-ए-अक़्दस से बाहर निकले। आप पर एक खास कैफियत तारी थी। जब इस हालत से बेदार हुए और दिली सुकूलन मिल गया तो आपको फरमाने रिसालत याद आया, मगर हैरान थे कि हिन्दुस्तान किधर है और अजमेर कहां है ? इसी फिक्र में थे कि शाम हो गई और सूरज डूब गया। इशा की नमाज के बाद आंख लगी और आप सो गये। ख़्वाब की हालत में हिन्दुस्तान का नक्शा और अजमेर का मन्जर आपके सामने था। जब नींद से आंख खुली तो सज़्दा-ए-शुक्र अदा किया और रौज़ा-ए-अक़्दस पर हाजिर होकर तोहफा-ए-दरूद व सलाम पेश करके हिन्दुस्तान की जानिब रवाना हुए।

हुजूर ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ र.अ. अपने सफर के दौरान मुल्क शाम भी गये, मगर यह पता नहीं है कि आप वापसी में शाम गये या जाती दफा इधर से गुज़रे।

ख़्वाज़ा ग़रीब नवाज़ र.अ. इस सफर का हाल खुद बयान फरमाते हैं-

एक बार मैं एक शहर में पहुंचा जो शाम के पास है वहां एक बजुर्ग एक गार (गुफा) में रहा करते थे। उनके बदन का गोश्त (मांस) सूख गया था, सिर्फ हड्डियां बाकी थीं। यह बुजुर्ग एक मोटे कपड़े पर बैठे हुए थे और दो शेर दरवाजे पर खड़े थे। मैं उनकी मुलाकात को गया, मगर उन शेरों की वजह से अन्दर जाने की हिम्मत न हुई। शेख़ ने मुझे देखकर फरमाया-‘चले आओ, डरो नहीं।’

यह सुनकर मैं अन्दर चला गया और अदब से बैठ गया। कहने लगे, जब तक किसी चीज का इरादा न करोगे वह भी
तुम्हारा इरादा न करेगी। फिर फरमाया-‘जिसके दिल में ख़ौफे खुदा होता है, हर चीज़ उससे डरती है।

फिर मुझसे पूछा-‘कहां से आना हुआ ?’ ‘अर्ज किया, बग़दाद से’, कहने लगे-‘खुश आमदीद, लेकिन
अच्छा यह है कि दुवेशों की खि़दमत करते रहो, ताकि तुम्हारे अन्दर भी दुरवेशों का जौक पैदा हो।’

फिर फरमाया-‘मुझे कई साल इस गुफा में रहते गुजर गये, एक बात से डरता हूं।’ मैंने पूछा वह क्या बात है।

उन्होंने कहा-‘नमाज़ है जिसके अदा करने के बाद इस ख़ौफ से कि कोई भूल-चूक न रह गयी हो और नमाज़ ही मेरे
लिए इताब (अल्लाह की पकड़) हो जाए, रोता हूं। बस ऐ दुरवेश ! अगर नमाज़ अदा की तो सुब्हान अल्लाह वरना मुफ्त में उम्र बेकार हुई।’

इसके बाद कहने लगे-‘नाम को नियम से पूरा न करना, इससे ज्यादा कोई गुनाह नहीं। मुझे मालूम नहीं कि मेरी नमाज़
खुदा-ए-तआला ने कुबूल फरमाई या नहीं।’

फिर मुझे एक सेब दिया और फरमाया-‘कोशिश करो कि हक्के नमाज़ अदा हो जाए वरना कल कि़यामत के दिन शर्मिन्दगी होगी।

ख़्वाजा साहब र.अ अल्लाह के दरबार में

हज़रत ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ र.अ. 583 हिज़री में मक्का शरीफ पहुंचे और खाना-ए-काबा की जि़यारत की। अक्सर (अधिकतर) काबा शरीफ का तवाफ करते और इबादत में मशगूल रहते। आपने वहां बेशुमार बरकतें हासिल की। एक दिन का वाकिया है कि हज़रत ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ र.अ. ख़ाना-ए-क़ाबा में इबादत में मशगूल थे, ग़ैब से आवाज आई ‘ऐ मुईनुद्दीन!
मैं तुझसे राजी हूं, तुझे बख़्श दिया। जो कुछ तेरा दिल चाहे मांग ले।’

ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ र.अ. यह सुनकर बहुत खुश हुए और बेखुद होकर सज़्दे में गिर पड़े। आपने बारगाहे इलाही में बहुत आजिज़ी से अर्ज किया-‘खुदा वन्दा । जो मेरे सिलसिले में मुरीद हों उनको बख्श दे।’ उसी वक्त आवाज आई।

‘ऐ मुईनुद्दीन ! तेरी दुआ मकबूल है और कियामत तक तेरे सिलसिले में जो दाखिल होगा उसे बख्श दूंगा।

ख़्वाजा साहब र.अ. बग़दाद में

हमदान से रवाना होकर हज़रत ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ र.अ. ने बग़दाद में कियाम फरमाया। बग़दाद उस ज़माने में इल्म व फन का मरकज़ (केन्द्र) था। बड़े-बड़े प्रभावशाली और बुलन्द मर्तबा आलिम, फाजि़ल सूफी और औलियाअल्लाह वहां मौजूद थे। उनकी मजलिसे आलिमों और फाजि़लों से भरी रहती थीं। ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ र.अ. भी उनकी एक-एक महफिल में पहुंचते और फैज़ हासिल करते रहे। बग़दाद पहुंचकर हुजूर ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ र.अ. को मालूम हुआ कि उस ज़माने के बेमिस्ल (बेजोड़) आलिम शेख अबू नजीब सहरवरदी र.अ. और जनाब पीराने पीर दस्तगीर सैयद अब्दुल क़ादर जीलानी र.अ. इन्तिकाल फरमा चुके थे। ख़्वाजा साहब र.अ. इन बुजुर्गों के मज़ार पर हाजिर हुए और एतकाफ फरमाया। इनके अलावा आपने दूसरे बुजुर्गों के पुर नूर मज़ारों पर भी हाजिरी दी और फैज ़बातनी हासिल किया।

सफ़र और बुज़ुर्गों से मुलाक़ातें

ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ र.अ. ने पीर व मुर्शिद हज़रत ख़्वाजा उस्मान हारूनी र.अ. से इजाज़ हासिल करके बग़दाद का रुख़ किया। रास्तें मे कई जगहों पर ठहरते हुए खि़रक़ान पहुंचे। खि़रक़ान उस ज़माने में एक छोटा-सा क़स्बा था मगर उसकी शोहरत शेख़ अबुल हसन खि़रक़ानी र.अ. की वजह से थी। ख़्वाजा साहब ने आपकी ज़ात से बातनी फ़ैज़ (आंतरिक शांति) हासिल किया। कुछ दिन खि़रक़ान में कि़याम फ़रमाने के बाद आप वहां से आगे बढ़े। रास्तें में जहां कोई ख़ुदा रसीदा बुज़ुर्ग का मज़ार मिला आपने कि़याम फ़रमाया और बातनी फ़ैज़ हासिल किया।

माजि़न्दान की सरहद के क़रीब इस्तराबाद एक मशहूर और अच्छा शहर था। जिस वक़्त आप वहां पहुंचे, शेख़ नासिरुद्दीन र.अ. वहां कि़याम पज़ीर (ठहरे) थे। वह एक बुलन्द मर्तबा और ख़ुदा रसीदा बुज़ुर्ग थे। उनका सिलसिला सिर्फ़ दो वास्तों से हज़रत शेख़ बायज़ीद बुस्तामी र.अ. से मिलता था। हज़रत ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ र.अ. काफी दिन तक उनकी खि़दमत में रहकर नूरे इरफान हासिल करते रहे। वहां से रवाना होकर इस्फ़ाहान चले गये। उस वक़्त इस्फ़ाहान दुनिया के ख़ूबसूरत और मशहूर शहरों में गिना जाता था। उन्हीं दिनों इस्फ़ाहान में शेख महमूद इस्फ़ाहानी तशरीफ़ फ़रमा थे। हमारे ख़्वाजा ने आपसे मुलाकात की। यह मुलाकात भी अजीब व ग़रीब थी।
दो मरदाने हक़ आमने-सामने खड़े थे और दो जानिब से नूर की बारिश हो रही थी।

कुदरत का करिश्मा तो देखिये कि उसी ज़माने में हज़रत ख़्वाजा कुतुबुद्दीन बखि़्तयार काकी र.अ. मुर्शिद कामील की तलाश में सफ़र करते हुए इधर आ निकले और इस्फ़ाहान र.अ. की खि़दमत में हाजि़र होते रहते थे, क्योंकि आप उनसे बहुत अक़ीदत (श्रद्धा) रखते थे, इसलिए आपसे बैअत करना चाहते थे मगर कुदरत को कुछ और ही मन्जूर था। एक दिन आपकी नज़र हज़रत ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती र.अ. पर पड़ गयी जिससे नूरानी किरणें निकल रही थी। बस फिर क्या था, आप हज़रत ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती र.अ. की खि़दमत में हाजि़र होने के लिए बेक़रार हो गये और एक दिन हुज़ूर ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ र.अ. की खि़दमत में हाजि़र हो गये, और आपके दस्ते हक़ परस्त पर बैत करके इरादतमन्दों में शामिल हो गये।

हज़रत ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ र.अ. इस्फ़ाहान से कूच फ़रमाकर हमदान पहुंचे। वहां उस वक़्त के सबसे बड़े और ज़बरदस्त आलिम शेख यूसुफ़ हमदानी र.अ. से मुलाक़ात करके फ़ैज़ व बरकत हासिल किया।
हमदान सेरवाना होकर आप तबिरेज पहुंचे। उन दिनों में हजरत शेख अबू सई तबरेजी र.अ. की बहुत शोहरत थी। कुछ दिन वहां रहकर उनकी पाक सोहबत (संगत) से दिली सुकून हासिल करते रहे। बाद में आप बगदाद तशरीफ ले गये।

ख़्वाजा र.अ. बीस साल तक पीर की खि़दमत में

हज़रत ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती एक मुद्दत से ही हज़रत ख़्वाजा उस्मान हारूनी र.अ. से अक़ीदत रखते थे। अब इस क़दर शेदाई हो गये कि हर वक़्त सफ़र हो या कि़याम (ठहराव) हो अपने गुरू की खि़दमत में हाजि़र रहते। उनका बिस्तर, तकिया, पानी का मशकीज़ा और दूसरा ज़रूरी सामान अपने सर और कन्धों पर रखकर हमसफ़र (साथ-साथ) होते थे। हज़रत ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ र.अ. बीस साल तक अपने पीर (गुरू) की खि़दमत में रहकर अल्लाह तआला की इबादत करते रहे। और उसी अर्से में मारफ़त व हक़ीक़त की सभी मंजि़लें तय (पूरी) कर लीं और फ़क़ीरी से अच्छी तरह वाकि़फ़ हो गये। आपने पीर व मुर्शिद से जो नसीहत भरी बातें सुनीं और हैरतअंगेज़ करामात देखे उनमें से कुछ का बयान ख़ुद ख़्वाजा बुज़ुर्ग के शब्दों में पेश किया जाता है।-

एक बार मैं अपने पीर हज़रत ख़्वाजा उस्मान हारूनी र.अ. के साथ सिवस्तान के सफ़र में था कि एक दिन हम एक ख़ानक़ाह (सोमआ) में पहुंचे। वहां एक बुज़ुर्ग रहते थे। उन बुज़ुर्ग का नाम सदरुद्दीन सिवास्तानी था । मैं कई दिन तक उनकी खि़दमत में रहा। जो शख़्स उनकी खि़दमत में हाजि़र होता खाली हाथ वापस नहीं जाता। आप अन्दर से कोई चीज़ लाकर देते और फ़रमाते कि मेरे हक़ में दुआ करो कि मैं ईमान सलामत लेकर जाऊं।

यह बुज़ुर्ग जिस वक़्त क़ब्र की सख़्ती और मौत का हाल सुनते तो ख़ौफ़े ख़ुदा से बेद की तरह कांपने लगते और और आंखों से ख़ून के आंसू जारी हो जाते। सात-सात दिन तक लगातार रोते रहते और इस तरह रोते कि देखने वाले भी रोने लगते। जब मैं आपकी खि़दमत में हाजि़र हुआ तो आप इसी हालत में थे और जब आपको सुकून हुआ तो मेरी तरफ़ ध्यान देकर फ़रमाया-‘ऐ अज़ीज़! जिसके सामने मौत खड़ी हो और जिसका दुश्मन मौत का फ़रिश्ता हो उसको सोने और ख़ुश रहने से क्या काम ?’ और फिर फ़रमाया-‘अगर तुम्हें उन लोगों का हाल मालूम हो जाए जो ज़मीन के नीचे सोते हैं और बिच्छू भरी कोठरी में बन्द हैं तो इस तरह पिघल जाओंगे जिस तरह नमक पानी में पिघल जाता है।’ इसके बाद फ़रमाने लगे।
आज तीस साल के बाद तुम्हें यह वाकि़या (घटना) सुनाता हूं कि बसरा के क़ब्रिस्तान में एक क़ब्र के पास मेरे साथ एक बुज़ुर्ग बैठे हुए थे। उस क़ब्र के अन्दर मुर्दे पर अज़ाब नाजि़ल हो रहा था क्योंकि वह बुज़ुर्ग साहिबे कश्फ़ थे, उन पर क़ब्र का हाल रोशन हो गया। यह देखकर ज़ोर से नारा मारा और ज़मीन पर गिर पड़े। हमने उठाना चाहा मगर उनकी रूह जिस्म से परवाज़ कर चुकी थी और देखते-देखते थोड़ी में इनका जिस्म नमक की तरह पिघलकर पानी बन कर बह गया। जो ख़ौफ़ उन बुज़ुर्ग में देखा वह आज तक किसी में न देखा न सुना।’

उसके बाद आपने अपनी आदत के मुताबिक मुझे भी दो खजूर देकर विदा किया।

एक दिन हज़रत ख़्वाजा उस्मान हारूनी र.अ. ने ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ र.अ. की तरफ़ मुखातब होकर फ़रमाया-‘कल कि़यामत के दिन, जितने अम्बिया, औलिया और मुसलमान हैं, जो कोई नमाज़ की जि़म्मेदारियों से सलामती के साथ निकल गया, वह बच गया और जिसने नमाज़ की पाबन्दी नहीं की उसे दोज़ख में रहना होगा।

अल्लाह तआला क़ुरआन मजीद में फ़रमाता है-
फ-वैलुल्लिल मुसल्लीनल्लज़ी-न हुम अन सलातिहिम साहून॰

तर्जुमा-वेल हे, उन नमाजि़यों के लिए जो नमाज़ में सुस्ती करते हैं। इसकी तशरीह (सविस्तार) इस तरह की है कि वेल दोज़ख में एक कुंआ है जिसमें बहुत दर्दनाक अज़ाब रखा गया है।
जो लोग नमाज़ में सुस्ती करते हैं और वक़्त पर अदा नहीं करते वह अज़ाब उन्हीं लोगों के लिए है। फिर आपने वेल के बारे में कहा-‘वेल सत्तर हज़ार बार ख़ुदा-ए-तआला से अजऱ् करता है कि यह अज़ाबे सख़्त किस गिरोह पर किया जायेगा ?’ हुक्म बारी तआला होता हे कि -यह अज़ाब उन लोगों के लिए हे जो अपनी नमाज़ें वक़्त पर नहीं पढ़ते।’

एक बार मैं और पीर व मुर्शिद सफ़र करते हुए दरया-ए- दजला के किनारे पहुंचे तो दरिया में तूफ़ान आया हुआ था। मुझे
फिक्र (चिन्ता) हुई, हज़रत ने फ़रमाया-‘आंखें बन्द करो।’ थोड़ी देर बाद जो आंखें खोली तो मैं और हज़रत मुर्शिद दजला के उस पार थे। मैंने अजऱ् किया–इसे किस तरह पार किया।’ इर्शाद हुआ-‘पांच बार अलहम्दु शरीफ़ पढ़कर दरिया से पार उतर आये।

एक बार मैं अपने मुर्शिद हज़रत ख़्वाजा उस्मान हारूनी र.अ. के साथ सफ़र में था। रास्ते में ख़्वाजा बहाउद्दीन र.अ. से
मुलाक़ात हो गई। उनका दस्तूर था कि जो शख़्स उनकी खि़दमत में हाजि़र होता, खाली हाथ नहीं जाता। अगर कोई नंगा आ जाता तो आप अपने कपड़े उतार, देना चाहते, उसी वक़्त फ़रिश्ते अच्छा लिबास हाजि़र कर देते। हम कुछ दिन उनकी महफि़ल में रहे। जब हम चलने लगे तो आपने नसीहत फ़रमाई-‘जो कुछ तुझे मिले उसे अपने पास न रखना बल्कि ख़ुदा की राह में दे देना, ताकि ख़ुदा के दोस्तों में तुम्हारा शुमार (गिनती) हो।’

एक बार दुरवेशों की एक महफि़ल में अपने पीर व मुर्शिद हज़रत ख़्वाजा उस्मान हारूनी र.अ. की खि़दमत में हाजि़र था, इतने में एक बूढ़ा शख़्स आपकी खि़दमत में आया। उसने आपको सलाम किया, पीर व मुर्शिद ने खड़े होकर सलाम का जवाब दिया और बड़े अदब से बिठाया। उसने अजऱ् किया-‘मेरा लड़का तीस साल हुए मुझसे जुदा है।’ पता नहीं जि़न्दा है या नहीं। मैं उसकी जुदाई से निढाल हो गया हूं। आप मेरी मदद फ़रमायें, उसकी वापसी, तन्दुरुस्ती और सलामती के फ़ातिहा इख़्लास की इल्तिज है।’ हज़रत ने जब ये बात सुनी तो, मुराक़ाबे में (ध्यान मगन) सर झुका दिया, थोड़ी देर बाद सर उठाकर हाज़रीन से फ़रमाया-‘इस पीर मर्द के लड़के की सलामती के लिए फ़ातिहा इख़्लास पढ़ों’ अतः फ़तिहा इख़्लास पढ़ी गई। इसके बाद आपने उस बूढ़े से फ़रमाया-‘आप जायें और जिस वक़्त आपका लड़का मिल जाये उसको साथ लेकर मेरी मुलाक़ात को आयें।

अभी वह बूढ़ा शख़्स रास्ते में ही था कि एक शख़्स ने आकर ख़बर दी कि आपका लड़का मिल गया। घर पहुंचकर लड़के को सीने से लगाया और उलटे पांव लड़के को लेकर हुज़ूर की खि़दमत में हाजि़र हुआ। ख़्वाजा उस्मान हारूनी र.अ. ने उस लड़के से मालूम किया कि मियाँ तुम कहां थे ? उसने अजऱ् किया-‘समुद्र में एक नाव पर था और नाव के मालिक ने मुझे ज़ंजीरों से बांध रखा था। आज एक दुरवेश आपके हमशक्ल बल्कि आप ही थे, तशरीफ़ लाये और ज़ंजीरों को तोड़कर मेरी गरदन ज़ोर से पकड़ी और अपने आगे खड़ा करके हुक्म दिया कि अपने पांव मेंरे हाथ पर रखों और आंखें बन्द करो। थोड़ी देर बाद फ़रमाया-‘आंखें खोलो।’
जिस वक़्त मैंने आंखें खोली तो अपने आपको तन्हा अपने मकान के दरवाज़े पर खड़ा पाया। इतना कहकर वह कुछ और कहना चाहता था मगर हज़रत ने इशारे से चुप रहने के लिए कहा। बूझ़े ने यह सुनकर हज़रत के क़दमों पर सिर रख दिया और बाप बेटे चले गये।

हज़रत ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती र.अ. पूरे बीस साल तक अपने पीर व मुर्शिद हज़रत ख़्वाजा उस्मान हारूनी र.अ. की
खि़दमत में हाजि़र रहे। जान व दिल से पीर के हर हुक्म का पालन करते रहे। आपकी इस जान-तोड़ खि़दमत के बदले हज़रत शेख़ ख़्वाजा उस्मान हारूनी र.अ. ने ऐसी नेमत और दौलत अता फरमाई जो हद व हिसाब से बाहर है अतः मारफ़त व हक़ीक़त की तमाम मंजि़लें तय कराने के बाद पीरे कामिल हज़रत शेख़ ख़्वाजा उस्मान हारूनी र.अ. ने वह तमाम तबर्रुकात जो उन्होंने बुज़ुर्गाने अज़ीम से हासिल की थीं अपने होनहार मुरीद हज़रत ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती
को अता फ़रमाकर नसीहत फ़रमाई-‘ऐ मुईनुद्दीन ! अल्लाह की मख़्लूक से किसी चीज़ का लालच न करना। कभी भी आबादी में ठहरना, और किसी से कुछ ना मांगना।

ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ र.अ. फ़रमाते हैं कि इसके बाद पीर व
मुर्शिद ने फातिहा पढ़कर मेरे सर और आंखों को चूमा और फ़रमाया-‘तुझे ख़ुदा के सुपुर्द किया। मुईनुद्दीन हक़ का महबूब है और मुझको इसकी मुरीदी पर बड़ा नाज़ है।

ख़्वाजा साहब र.अ. पीरे कामील की खि़दमत में

क़स्बा हारून एक छोटा-सा क़स्बा था लेकिन शाने ख़ुदावन्दी तो देखो कि इस छोटे से क़स्बे पर अल्लाह की रहमत बरस रही थी, यानी इन दिनों वहां हज़रत ख़्वाजा शेख़ उस्मान हारूनी र.अ.जल्वा अफ़रोज़ थे और उनकी वजह से तमाम क़स्बा ख़ैर व बरकत से मामूर (भरा) था। हज़रत शेख़ उस्मान हारूनी र.अ. महान औलियाओं में से थे और आपके फ़ैज़ व बरकत की चर्चा दूर-दूर तक फैली हुई थी, हाजतमन्द और अल्लाह के चाहने वाले अपनी मुरादों की झोलियां भर-भरकर ले जाते थे।

हुज़ूर ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ र.अ. के इश्क़ का जज़्बा आखि़रकार आपको मंजि़ल पर ले आया, यानी आप क़स्बा-ए-
हारून में दाखि़ल हो गये। उस वक़्त आपकी ख़ुशी की इन्तिहा न रही क्योंकि आपने अब चश्मा-ए-आबे बक़ा को पा लिया था यानी पीरे कामिल को पा लिया था।

हमारे ख़्वाजा र.अ. दूर से सफ़र करते हुए हारून पहुंचे थे इसलिए आपका जिस्म मुबारक गर्द आलूद (धूल युक्त) हो गया था और लिबास गुबार में अटा हुआ था। आप बेक़रार ज़रूर थे मगर चेहरे पर ताज़गी और संजीदगी (गंभीरता) दिखाई देती थी। हज़रत ग़रीब नवाज़ र.अ. ने हज़रत ख़्वाजा शेख़ उस्मान हारूनी र.अ. के दस्ते हक़ परस्त पर बैअत की और ख़्वाजा उस्मान हारूनी र.अ. ने आपको अपने शागिर्दों में शामिल कर लिया।

हज़रत ख्वाजा गरीब नवाज़ र. अ. के मुरीद होने का वाकिया खुद आपके शब्दों में यहाँ पेश किया जाता हे !

में एक इसी सोहबत में जिसमें जलीलुल क़द्र बुजुर्ग मौजूद थे बहुत अदब से हाजि़र हुआ और सरे नियाज़ ज़मीने अदब पर झुका दिया।

हुज़ूर ने हुक्म फ़रमाया-

‘दो रक्अत नमाज़ अदा करो।’

मैंने हुक्म का पालन किया, फिर हुक्म हुआ।

‘कि़बला रुख़ बैठ जाओं।’

मैं अदब से कि़बला रुख़ बैठ गया।

फिर इर्शाद फ़रमाया-‘सूरः बक़रः की तिलावत करो।’

मैंने अदब के साथ तिलावत की, फिर हुक्म हुआ-‘साठ बार सुब्हाल्लाह पढ़ो।’ मैंने पढ़ा। फिर हुज़ूरे वाला ने मेरा हाथ अपने हाथ में लिया और आसमान की तरफ़ नज़र उठाकर देखा और ज़बान मुबाकर से यह इर्शाद फ़रमाया-‘मैंने तुझे ख़ुदा तक पहुंचा दिया।’

इन सभी बातों के बाद हज़रत शेख़ उस्मान हारूनी र.अ. ने एक ख़ास कि़स्म की तुर्की टोपी मेरे सर पर रखी जो कुलाह चहार तुर्की कहलाती है और जुब्बा (चोग़ा) मुबारक मुझे पहनाया। फिर फ़रमाया-बैठ जाओ।’
मैं फ़ौरन बैठ गया। अब फिर हुक्म हुआ।

‘हज़ार बार सूरः इख़्लास पढ़ो।’

जब मैं इससे फ़ारिग़ हुआ तो फ़रमाया-‘हमारे मशाइख़ के यहां सिर्फ़ एक दिन रात की इबादत है, इसलिए जाओ और एक दिन रात बराबर इबादत करो।

ये हुक्म सुनकर मैंने एक दिन रात पूरी इबादतें इलाही और नमाज़ में गुज़ार दी। दूसरे दिन खि़दमत में हाजि़र होकर
क़दम-बोसी की दौलत हासिल की ओर हुक्म के मुताबिक बैठ गया। इर्शाद फ़रमाया-‘इधर देखो।’ (आसमान की तरफ़ इशारा करके) मैंने आसमान की तरफ़ नज़र उठाई। आपने पूछा-‘कहां तक दिखता है ?’
मैंने जवाब दिया, ‘अर्शे मोअल्ला तक।’

फिर इर्शाद हुआ, ‘नीचे देखो।’ ?

मैंने नीचे देखा तो फिर वही फ़रमाया-‘कहां तक दिखता है?

मैंने जवाब दिया, ‘तहतुस्सरा (पाताल) तक।’

फिर हुक्म हुआ-‘हज़ार बार सूरः इख़लास पढ़ों’

मैंने हुक्म का पालन किया तो हज़रत ने फिर फिर इर्शाद फ़रमाया-‘आसमान की तरफ़ देखो।’

मैंने देखा और अजऱ् किया-‘हिजाबे अज़मत तक साफ़ नज़र आ रहा है।’
फ़रमाया-‘आंखें बन्द करों’ मैंने आंखें बन्द कर ली। फिर हुक्म दिया-‘खोल दो’

मैंने आंखें खोल दीं।

इसके बाद आपने अपनी दो उंगलियां मेरे सामने की और पूछा-‘क्या दिखाई देता है। ?’

मैंने जवाब दिया-‘अट्ठारह हज़ार आलम मेरी आंखों के सामने है।’

जब मेरी ज़बान से ये जुम्ले (वाक्य) निकले तो आपने इर्शाद फ़रमाया-‘बस, अब तेरा काम पूरा हो गया।’

बाद में एक ईंट की तरफ़ , जो सामने पड़ी थी, इशारा करके फ़रमाया-‘इसकेा उठा लो।’

मैंने उठाया तो उसके नीचे से कुछ दीनार निकले, जिनके बारे में हुक्म हुआ-‘इन्हें ले जा, और फक़ीरों व ग़रीबों में बांट दे।’
मैंने हुक्म का पालन किया और फिर खि़दमत में हाजि़र हुआ।

इर्शाद हुआ-‘कुछ दिन हमारी खि़दमत में रहो।’

मैंने अजऱ् किया-‘हाजि़र हूं।

तलाशे हक़

शेख़ इब्राहीम क़न्दोज़ी र.अ. ने जब से हज़रत ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती र.अ. को इश्क़े इलाही की झलक दिखाई थी, उसी वक़्त से आपका दिल बेक़रार था। और अब तालीम की हवा ने इश्क़ की आग को भड़का दिया। इस तरह आपने एक दिन समरक़न्द को भी छोड़ा और अल्लाह का नाम लेकर मग़रिब (पश्चिम) की जानिब रवाना हो गये। मग़रिब की सरज़मीन बड़े-बड़े आरिफ़ाने हक़ के मज़ारों से भी पड़ी थी। और बड़े-बड़े ख़ुदा रसीदा बुज़ुर्ग उस सरज़मीन पर मौजूद थे, जहां क़दम-क़दम पर फ़ैज़ के दरिया जारी थे। समरक़न्द से एक रास्ता दक्षिण की तरफ़ बल्ख़ को जाता है। आप इसी रास्ते पर कामिल पीर (योग्य गुरू) की तलाश में चल पड़े मगर इस तमाम सफ़र में कोई पीरे कामिल न मिला और आप बराबर चलते रहे जैसे कोई ग़ैबी कशिश आपको खींचते लिए जा रही हो। नेशापुर से कुछ ही दूर चले थे कि क़स्बा हारून में पहुंच गये।

उलूमे ज़ाहिरी की तकमील

ख़ुदा की याद क्योंकि इल्म के बग़ैर नामुमकिन है, इसलिए हमारे ख़्वाजा ने सबसे पहले इल्म हासिल करने की तरफ़ ध्यान दिया ताकि अमल में कमी और ख़राबी न रहे। आपने अपने वतन को छोड़ दिया और इल्म की तलाश में निकल पड़े चूंकि तातारियों ने ख़ुरासान के ज़्यादातर दीनी मदरसों को नष्ट कर दिया था, इसलिए हमारे ख़्वाजा को इल्म की प्यास बुझाने के लिए दूर-दूर का सफ़र करना पड़ा। कठिन और दुश्वार रास्तों, नदियों और पहाड़ों और घने जंगलों को पार करते हुए हर कि़स्म की मुसीबतों और तकलीफ़ों को सहते हुए आप बराबर सफ़र करते रहे यहां तक कि बुख़ारा के मशहूर दीनी मदरसों में पहुंचकर आपने फि़क़्ह हदीस, तफ़्सीर और दूसरे अक़्ली इल्म की किताबें पढ़ीं और मौलाना हुसामुद्दीन बुख़ारी र.अ. जैसी मशहूर हस्तियों और दूसरे आलिमों से आपने इल्म हासिल किया। आखि़रकार मौलाना हुसामुद्दीन बुख़ारी र.अ. ने आपको दस्तारे फ़ज़ीलत अता फ़रमाई और इल्मे दीन से इतना मालामाल कर दिया कि आपकी गिनती उस वक़्त के मशहूर आलिमों में होने लगी। फिर भी इल्म की प्यास बाक़ी रही और आप मौलाना हुसामुद्दीन बुख़ारी र.अ. से रुख़्सत होकर समरक़न्द चले
गये, समरक़न्द में भी दीनी तालीम के एक मदरसे में पहुंचकर और अधिक इल्म हासिल किया।

जि़न्दगी में एक नया मोड़

ख़्वाजा साहब र.अ. शुरू से ही दुरवेशों, सूफि़यों और फ़क़ीरों की संगत में बैठते, उनका अदब करते और उनसे मुहब्बत रखते थे। एक रोज आप अपने बाग़ में पौधों को पानी दे रहे थे कि एक बुजुर्ग कही से फिरते-फिराते उस बाग़ की तरफ आ निकले, ये बुज़ुर्ग शेख़ इब्राहीम क़न्दोज़ी र.अ. थे। कम उम्र बाग़बान यानी ख़्वाजा साहब की नज़र जब उन पर पड़ी तो सब काम छोड़कर आपके पास आ गये और आपके हाथ को चूमा और बहुत अदब से एक सायादार पेड़ की छांव में लाकर बिठाया। और तो कोई सामान था नहीं मगर इन दिनों अंगूर का मौसम था और अंगूर के खुशनुमा गुच्छे लटक रहे थे। ख़्वाजा साहब ने अंगूरों का एक पका हुआ गुच्छा तोड़कर उनको पेश किया और उनके सामने अदब से बैठ गये। अल्लाह वाले बुजुर्ग को आपकी यह अदा बहुत पसन्द आई और उन्होंने खुशी से नोश फ़रमाये। बुजुर्ग की ख़ुदा शनास नज़रों ने फ़ौरन ताड़ लिया कि यह होनहार बच्चा राहे हक़ का तालिब है। उन्होंने अपनी जेब से खली का एक टुकड़ा निकाला और उसको अपने दांतों से चबाकर ख़्वाजा साहब के दहने मुबारक (मुख) में डाल दिया। हमारे ख़्वाजा क्योंकि शुरू से ही दूरवेशों का अदब करते और फ़क़ीरों से मुहब्बत रखते थे, इसलिए इब्राहीन क़न्दोज़ी र.अ. के दिये हुए खली के टुकड़े को खा गये। फिर क्या था, आपका दिल दुनिया से उचट गया और वहम के सभी परदे हट गये। खली का वह टुकड़ा हलक़ से उतरना था कि आप रूहानियत की दुनिया में पहुंच गये, दिल में एक जोशे हैरत पैदा हो गया, आंख खुल रह गई। जब आप उस हालत से बाहर आये तो अपने को तन्हा पाया। शेख़ इब्राहीम क़न्दोजी़ र.अ. जैसे आये थे वैसे ही जिधर मुंह उठा, चल दिये।

शेख़ इब्राहीम क़न्दोज़ी र.अ. तो चल दिये लेकिन हमारे ख़्वाज र.अ. ने जो जलवा देखा था वह आपकी नज़रों के सामने फिर रहा था ओर ऐसा नहीं था जिसको फरामोश किया जा सकता। वह बार-बार इसको देखने की ख़्वाहिश करते। आपने हर मुमकिन सब्र और तहम्मुल (धीरज) से काम लिया मगर फिर भी दिल क़ाबू में न रहा। इश्क़ की आग भड़क उठी और जब दीवानगी हद से बढ़ने लगी तो आपकी नज़रों में दुनिया और इसकी दौलत हक़ीर (तुच्छ) नज़र आने लगी। चुनांचे बाग़ और पवन चक्की को बेचकर, और जो कुछ नक़द व सामान पास मौजूद था, राहे ख़ुदा में फ़क़ीरों और बेसहारों में बांट दिया और थोड़ा-सा ज़रूरी सामान साथ लेकर तलाशे हक़ में निकल पड़े।