वादिल बुजुर्गवार का विसाल (निधन)

ख़्वाजा साहब र.अ. की उम्र अभी चैदह साल की थी कि बाप का साया सर से उठ गया और आप यतीम हो गये। वालिद ने तरके में एक बाग़ और एक पवन चक्की छोड़ी थी जो आपके हिस्से में आई, वालिद माजिद की मृत्यु के कुछ महीने बाद वालिदा माजिदा भी इस दुनिया से चली गईं। इस सख़्त सदमें का उन पर बहुत असर हुआ। और हमारे ख़्वाजा बे-यार व मददगार रह गये। उस वक़्त आपकी उम्र सिर्फ़ पन्द्रह साल की थी। इतनी उम्र में माँ-बाप का साया सर से उठना कोई मामूली बात नही। आपने सब्र किया मगर दुनिया से दिल उचट गया। आपने फ़ैसला किया, ‘‘यह दुनिया कुछ भी नहीं है।’’ हक़ीक़ी और असल राहत इन्सान को उसी वक़्त मिल सकती है जबकि वह अपने ख़ुदा को पहचान ले। मगर इस राह में भी रहनुमा की ज़रूरत थी। गुज़ारे के लिए सिर्फ़ एक बाग़ और एक पवन चक्की थी जो बाप की तरफ़ से तरके में मिली थी। हमारे ख़्वाजा र.अ. पौधों की देखभाल करते, इनको पानी देते और काट-छांट करते थे। हर तरह से बाग़ की निगरानी करते और इसी पर अपना गुज़र-बसर करते थे।

ख़ुरासान की मुख़्तसर तारीख़

हुजूर ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ र.अ. जिस ज़माने में पैदा हुए वह बड़ा ही पुर आशोब ज़माना था। बे-रहम तातारियों ने हर तरफ़ क़त्ल व ग़ारतगरी और लूट का बज़ार गर्म कर रखा था। अम्न व चैन किसी को भी नसीब नहीं था। इन दरिन्दों ने ख़ुरासान पर हमला कर दिया और सुल्तान सन्जर को उनसे शिकस्त हो गई। हर तरफ़ लाशों के ढेर लग गये। यही वह इलाक़ा था जिसमें एक तरफ़ तातारियों ने जुल्म ढा रखा था और दूसरी तरफ़ अक़ाइदे इस्लाम के खि़लाफ़ सख़्त कारगुज़ारी कर रहे थे क्योंकि सुल्तान ख़ुरासान को शिकस्त हो चुकी थी, इसलिए तातारी इलाक़े के लोग बिना किसी रोक-टोके के ख़ुरासान में दाखि़ल हो गये और कई शहरों जैसे ओश (मशहद) मुक़द्दस और नेशापूर को बर्बाद करके डाल दिया। लड़कों और लड़कियों को ग़ुलाम और लौंडी बनाया और तमाम मस्जिदों को तबाह व बर्बाद कर दिया, बेगुनाह लोगों की लाशो के ढेर लग गये और बहुत से बड़े-बड़े आलिम बेगुनाह शहीद कर दिये गये।
उस वक़्त ख़्वाजा साहब र.अ. की उम्र सिर्फ़ तेरह साल की थी ऐसा ख़ौफ़नाक ख़ून-ख़राबा देखकर आपका दिल बेचैन हो गया। होश संभाला ही था कि ये ख़तरनाक वाकि़यात नज़र से गुज़रे।

तालीम व तर्बियत

इब्दताई तालीम घर पर हुई। आपके वालिद बुज़ुर्गवार एक बड़े आलिम थे ख़्वाजा साहब ने नौ साल की उम्र में क़ुरआन मजीद हिफ़्ज़ कर लिया और इसके बाद सन्जर के मक्तब में दाखि़ला हुआ। आपने यहां इब्तदाई तौर से तफ़्सीर, फि़क़्ह और हदीस की तालीम पाई और थोड़े समय में आपने काफ़ी इल्म हासिल कर लिया।

नसब नामा मादरी (माता वंशानुक्रम)

ख़्वाजा साहब र. अ. की वालिदा माजिदा का वंशज
निम्न प्रकार है-

बीबी उम्मुलवरा
बिन्ते हज़रत सैयद दाऊद र. अ.
बिन हज़रत सैयद अब्दुल्लाह हम्बली र. अ.
बिन हज़रत सैयद ज़ाहिद र. अ.
बिन हज़रत सैयद मुहम्मद मूरिस र. अ.
बिन हज़रत सैयद दाऊद र. अ.
बिन हज़रत सैयद मूसा र. अ.
बिन हज़रत सैयद अब्दुल्लाह मख़फ़ी र. अ.
बिन सैयद हसन मुसन्ना रजि़. अ.
बिन सैय्यिदना इमाम हसन रजि़. अ.
बिन अमीरुल मोमिनीन सैयिदना हज़रत अली कर्रमल्लाहु वज्हुहू

नसब नामा पिदरी (पिता वंशानुक्रम)

आपके वालिद का वंशज निम्न प्रकार है-
हज़रत ख़्वाजा मुईनुद्दीन हसन चिश्ती र. अ.
बिन हज़रत ख़्वाजा गि़यासुद्दीन र. अ.
बिन हज़रत ख़्वाजा नजमुद्दीन ताहिर र. अ.
बिन हज़रत ख़्वाजा सैयद इब्राहीम र. अ.
बिन सैयद इदरीस र. अ.
बिन सैयद इमाम मूसा काजि़म र. अ.
बिन सैयद जाफ़र सादिक़ र. अ.
बिन सैयद मुहम्मद बाक़र र. अ.
बिन सैयद ज़ैनुल आबिदीन र.ता.अ.
बिन सैय्यिदना इमाम हुसैन रजि़ अ.
बिन अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली कर्रमल्लाहु वज्हुहू

वलादत बा सआदत

ख़्वाजा-ए-ख़्वाजगां हज़रत ख़्वाजा मुर्इनुद्दीन हसन चिश्ती अजमेरी रहमतुल्लाह अलैहि 537 हिजरी में ख़्ाुरासान प्रांत के सन्जर नामक गांव में पैदा हुए। सन्जर क़न्धार से उत्तर की जानिब है। और आज भी वह गांव मौजूद है। कई लोग इसको सजिस्तान भी कहते हैं। ख़्वाजा बुज़ुर्ग के वालिद माजिद का नाम सैयद गि़यासुद्दीन हसन है, वह आठवीं पुश्त में हज़रत मूसा काजि़म के पोते होते हैं। वालिदा माजिदा का नाम बीबी उम्मुलवरा उफऱ् बीबी माहे नूर है जो चन्द वास्तों से हज़रत इमाम हसन की पोती होती है। इसलिए आप बाप की तरफ़ से हुसैनी और माँ की तरफ़ से हसनी सैयद हैं।
आपकी वालिदा माजिदा हज़रत बीबी उम्मुलवरा से रिवायत है कि जिस वक़्त से मेरा नूरे नज़र मुर्इनुद्दीन मेरे शिकम (गर्भ) में आया, मेरा घर खैर व बरक़त से मामूर नज़र आने लगा। जो लोग हमारे दुश्मन थे मुहब्बत से पेश आने लगे। कर्इ बार मुझे ख़्ाूबसूरत ख़्वाब नज़र आते थे। जिस वक़्त अल्लाह तआला ने आपके जिस्म में जान डाली इस वक़्त से यह मालूम हो गया था कि आधी रात से लेकर सुबह तक मेरे शिकम से तस्बीह व तह्लील की आवाज़ आती थी। मैं उस मुबारक आवाज़ में सरशार हो जाती थी। जब आप पैदा हुए तो मेरा घर नूर से जगमगा उठा।

मनक़बत

हिन्द में घर-घर नसब मिल्लत का झन्डा कर दिया।

सफ़हा-ए-दुनिया पे दीं का बोलबाला कर दिया।

इश्क़े नामे मुस्तफ़ा हर दिल में पैदा कर दिया।

दैर का रुख़्ा जानिबे मेहराबे काबा कर दिया।।

मोतियों से दामने मक़सूद सबने भर लिए।

एक ज़मीने ख़्ाुश्क को पल भर में दरिया कर दिया।।

खूब फैलाइ जि़या शम्सुददुहा के नूर की।

मिल्लते रोशन से दुनिया में उजाला कर दिया।।

आपके फ़ैज़े क़दम से उठ गर्इ सब छूत-छात।

आपके इकराम ने अदना को आला कर दिया।।

कर दिया तौहीद के रिश्ते में सबको मुनसलिक।

हक़ के सब बिछड़े हुए बन्दों को यकजा कर दिया।।

हम से जो लाखों करोड़ों से न अब तक हो सका।

हल वो एक अल्लाह वाले ने मुअम्मा कर दिया।।

देखिये क्यों कर किया क़ब्ज़ा दिलों पर ख़्ाल्क के।

देखिये ख़्वाजा मुर्इनुíीं ने क्या क्या कर दिया।।