शहाबुद्दीन मुहम्मद गौरी हिन्दुस्तान के मोर्चे पर

सुल्तान शहाबुद्दीन मुहम्मद गौरी को एक साल पहले तरावजी के मैदान में पृथ्वीराज के मुकाबले में शर्मनाक शिकस्त (हार) हुई थी। और मुश्किल से जान बचाकर गजनी पहुंचा था। इन्तिकाम की आग उसके दिल भड़क रही थी और गुप्त रूप से लड़ाई की तैयारियां कर रहा था, लेकिन किसी को यह उम्मीद न थी कि इस कदर जल्द वह हिन्दुस्तान के मोर्चे पर रवाना हो जायेगा।

सुल्तान के मुबारक ख्वाब ने उसके दिल में एक नया जोश पेदा कर दिया था। आलिमों से अपने ख्वाब के ताबीर सुनते ही उसने लड़ाई के सामान की फेहरिस्त (सूची) मंगलवा कर देखी और लश्कर के कूच का डंका बजवा दिया और आठवे दिन खुद रिकाब में पैर रखकर रवाना हुआ। सभी अफसर हैरत में थे कि इस कदर जल्द तैयारी की क्या वजह हुई और यह लश्कर किस मोर्चे पर जा रहा है मगर किसी की हिम्मत न हुई कि सुल्तान से मालूम करे। जब यह लश्कर पेशावर में आकर ठहरा तो शाही खानदान के एक उम्र रसीदा शख्स ने सुल्तान की खिदमत में हाजिर होकर अर्ज किया-‘हुजूर इस मोर्चे में सामान तो जंगे अजीम (महायुद्ध) का दिखाई देता है लेकिन यह नहीं खुलता कि जाना किधर है ? सुल्तान ने एक ठंडी आह भरी और जवाब दिया। ऐ बुजुर्ग । तुमको मालूम नहीं है कि मुझ पर क्या गुजरी, क्या तुझे पिछले साल की हार याद नहीं रही ? क्या यह हार इस्लाम के नाम पर कोई मामूल सा धब्बा है? तू यकीन कर कि उस दिन से मैंने आज तक न कपड़े बदले हैं और न महल सरा में बिस्तर पर सोया हूं।

बुजुर्ग ने यह सुनकर शहाबुद्दीन गौरी की हिम्मत बढ़ाई और उसको दुआयें दीं, फत्ह का यकीन दिलाया और फरमाया-‘अगर हुजूर का यही इरादा है तो मसलहते वक्त को देखते हुए काम करना चाहिए। आप उन अमीरों और सरदारों के कुसूर माफ कर दें और उन्हें दरबार में बुलाकर इनाम व इकराम से मालामाल करें ताकि वह जान की बाजी लगाकर लड़ें और पिछली बदनामी का धब्बा मिटा दें। सुल्तान को बुजुर्ग का यह कीमती और सही मश्विरा बहुत पसन्द आया। जब लश्कर मुलतान पहंुचा तो तो सुल्तान ने दरबारे आम लगाया और छोटे-बड़े सभी अमीरों और सरदारों को बुलाया , उनकी गलतियाँ माफ़ करके उनसे कहा – ‘ऐ मुसलमानों ! पिछले साल बदनामी का जो धब्बा इस्लाम के माथे पर लगा है वह किसी से छुपा नहीं है इसलिए हर मुसलमान का यह फर्ज है कि उस कलंक के टिके को अपनी तलवारों के पानी से धो कर साफ करे। सभी सरदारों ने अपनी तलवारों के कब्जे पर हाथ रखकर झुका दिया, जैसे जबाने हाल से कह रहे थे कि हमारा वायदा पक्का है और हम उसे आखिरी सांस तक निभायेंगे।

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