ख्वाजा गरीब नवाज र.अ. के इर्शादात (कथन)

हुजूर ख्वाजा गरीब नवाज र.अ के इर्शादात अहले बसीरत के लिए बेश कीमत खजाना है। अल्लाह तआला हमें उनको समझने और उन पर अमल करने की तौफीक अता फरमाये। इर्शादात निम्न हैं-

1. गुनाह करने से इतना नुकसान नहीं होता जितना कि अपने किसी भाई को हकीर (तुच्छ) या ज़लील समझने से।

2.फकीरी का मुस्तहिक (लायक) वह शख्स है जो दुनिया-ए-फानी में अपने पास कुछ न रखे।

3.बन्दे पर फकीर का शब्द उस वक्त लागू है कि जब आठ साल तक बायें हाथ का फरिश्ता जो बदी लिखने वाला है उसके आमालनामे में एक भी बदी न लिखे।

4.खुदा की शनाख्त (पहचान) उस शख्स को होगी जो दुनिया वालों से अलग रहे और खुद को बड़ा न समझे।

5.खामोश और गमगीन रहना आरिफों की एक अलामत (पहचान) है।

6.पूरी दुनिया और कायनाते आलम को अपनी दो उंगलियों में देखना इरफान का एक दर्जा है।

7.बुजुर्ग वह है जो अपना दिल दोनों जहान से उठा ले और हरदम आलमे गैब से लाखों तजल्लियां उस पर जाहिर हों और अल्लाह तआला के सिवा किसी से मदद न चाहे।

8.नमाज मोमिनीन को अल्लाह तआला से मिलायेगी, इसकी हिफाजत पूरी तरह करनी चाहिए।

9.हर रोज आसमान से दो फरिश्ते उतरते हैं। उनमे से एक पुकारता है कि जिससे फर्जे इलाही जान-बूझकर छूट गया वह अल्लाह तआला की जमानत से बाहर हो गया। फिर दूसरा कहता कि जिसने रसूलुल्लाह स.अ.व. की सुन्नत को छोड़ा वह कियामत के रोज शफाअत से महरूम रहेगा।

10. जो शख्स पांचों वक्त पाबन्दी के साथ नमाज अदा करता है कियामत के दिन उसकी नमाज उसकी हिफाजत और निगहबानी करेगी।

11. जो शख्स फज्र की नमाज पढ़ कर सूरज उगने तक उसी जगह बैठा रहे और नमाजे इशराक पढ़ कर उठे तो हक तआला उसे मय सत्तर हजार आदमियों के जो उसके अहल (योग्य) हों बख्श देता है।

12. पांच चीजों का देखना इबादत है, चाहे वे चीजें अलग-अलग क्यो न देखी जायें-
(1) मां-बाप को देखना
(2) कुरआन मजीद का देखना
(3) अल्लाह वालों का देखना
(4) खाना-ए-काबा का देखना
(5) अपने पीरे तरीकत का देखना

13. बाज (कुछ) बुजुर्गों ने सुलूक के सौ दर्जे मुकर्रर किए हैं। उनमें सत्तर दर्जे तय करने के बाद कश्फ व करामात का रुतबा हासिल होता है। जो शख्स अपने आपकेा कश्फ व करामात के दर्जे में जाहिर नहीं करता, वह बाकी तीस दर्जे भी तय कर जाता है। बस, बुजुर्गी के लिए जरूरी है कि वह अपने आपको उस दर्जे में जाहिर न करें और पूरे सौ दर्जे तय कर लें।

14. हमारे खानदाने सुलूक के पन्द्रह दर्जे हैं। पांचवां दर्जा कश्फ व करामात का है। हमारे बुजुर्गों ने वसीयत की है कि पांचवें दर्जे पर ही न ठहरे बल्कि पूरे पन्द्रह दर्जे हासिल कर ले।

15. मुहब्बत के चार दर्जे हैं-
1.हमेशा अल्लाह तआला का जिक्र करना।
2.जिक्र इलाही को खूब दिल लगाकर करना और उसके जिक्र में खुश रहना।
3.वह खूबी पैदा करना जो दुनियावी मुहब्बत से अलग हो।
4.हमेशा रोते रहना।

16. जो शख्स चाहता है कियामत के सख्त (भयानक) अजाब से महफूज रहे तो उसके लिए लाजमी है कि वह मुसीबत में रहने वालों की फरियाद सुने, जरूरतमन्दों की जरूरत पूरी करे और भूखों को पेट भर कर खिलायें।

17. चार काम नफ्स के लिए जीनत (शोभा) है-
1.भूखे को खाना खिलाना।
2. मुसीबत जदा की मदद करना।
3.जरूरतमन्दों की जरूरत पूरी करना।
4.दुश्मन से मेहरबानी और अच्छे सुलूक से पेश आना

18. जिस शख्स में तीन खासियतें हों खुदा उसको दोस्त रखता है-
1.दरिया जैसी सखावत (दानशीलता)
2.सूरज जैसी शफ्कत (भलाई)
3.जमीन जैसी तवाजो।

19. नेक काम करने से बेहतर नेकों की सोहबत और बुरे काम करने से बदतर बुरों की सोहबत है।

20. सोहबत का असर जरूर होता है। बुरी सोहबत से बुरा असर और नेक सोहबत से अच्छा असर होता है।

21. हाजत रवाई के लिए सूरः फातिहा पढ़ना बेहद फायदेमन्द साबित हुआ है।

22. नदी नाले और दरिया के पानी बहने में आवाज होती है लेकिन जब वह समुद्र से जाकर मिल जाते हैं तो कामिल सुकून हो जाता है, इसी मिसाल को सुलूक की मन्जिलें मान लेना चाहिए।

23. हर दौर में दुनिया के अन्दर खुदा के सैंकड़ों ऐसे मक्बूल व प्यारे बन्दे होते हैं जिन्हें कोई नहीं जानता और वह गुमनामी के गोशे में इन्तिकाल (देहान्त) फरमा जाते हैं। अतः दुनिया को औलियाओं से खाली मत समझो।

24. खुदा की पहचान उसे होगी जो लोगों से अलग-अलग रहे। दुनियादार बुजुर्ग होने का दावा न करे।

25. बुजुर्गी की निशानी यह है कि खुदा के सिवा तमाम चीजों की मुहब्बत दिल से निकाल दे।

26. सिर्फ दिल और जिस्म से काबे का तवाफ न करें, क्योंकि आरिफ (खुदा शनास) वह है जिसका दिल अर्श और हरमैन के चक्कर लगाता रहे।

27. खामोश और गमगीन रहना बुजुर्गी की एक निशानी है।

28. तमाम इबादतों से ज्यादा अफजल (उत्तम) लाचारों और मजलूमों की फरियाद को पहुंचाना है।

29. आरिफ हर वक्त इश्क की आग में डूबा रहता है। अगर खड़ा है तो दोस्त ही के इश्क में खड़ा है, बैठा है तो उसी का जिक्र कर रहा है, सोया है तो ख्याले दोस्त में बेखबर है और जागता है तो उसी के ख्याल में होता है।

30. आरिफ पर एक हाल होता है, उस वक्त वह कदम उठाया करते हैं। एक कदम में हिजाब अजमत से गुजर कर हिजाबे किब्रीयाई तक पहुंचते हैं और दूसरे कदम में वापस आ जाते हैं। यह बयान फरमाते हुए हजरत ख्वाजा गरीब नवाज र.अ. के आंसू जारी हो गये।

31. आरिफ वह है, जो कुछ चाहे सामने आ जाये और जो कुछ पूछे उसका जवाब मिले।

32. बद बख्त वह है जो गुनाह करे और उम्मीद रखे कि मैं मकबूल बन्दा हूं।

33. सखावत करना नइर्म (नमेत पान ेवाला) हाने ेकी चाबी ह।ै

34. दुरवेश वह है जो हाजतमन्दों को महरूम (निराश) वापस न करे।

35. राहे मुहब्बत में जीत उसकी होती है जो दोनों जहान से बेताल्लुक हो जाये।

36. तवक्कुल यह है कि लोगों के रंज व मुसीबत उठाए और किसी से शिकायत और इजहार न करे।

37. जितना ज्यादा अल्लाह में ध्यान होगा उतना ही ज्यादा हैरत बढ़ेगी।

38. इल्म (ज्ञान) दरिया की धारा है और अल्लाह का ध्यान दरिया की एक लहर है, फिर खुदा कहां और बन्दा कहां। इल्म खुदा को है और इरफान (अललाह का ध्यान) बन्दे को है।

39. अल्लाह में ध्यान रखने वाले सूरज की तरह रोशन रहते हैं और तमाम दुनिया को रोशन रखते हैं।

40. आरिफ मौत को दोस्त, आराम को दुश्मन और अल्लाह के जिक्र को प्यारा रखते हैं।

41. जो शख्स वुजू करके सोता है उसकी रूह अर्श के नीचे सैर करती रहती है।

42. आशिकों का दिल मुहब्बत की आग से जला हुआ होता है और जो कुछ उसके अन्दर आता है यह आग उसको भी
जलाकर राख कर देती है।

43. मुहब्बत में अदना (निचला) दर्जा यह है कि अल्लाह की सिफात (विशेषता) उसमें दिखाई दे और आला (उच्च) दर्जा यह है कि अगर उस पर कोई दावा करे तो उसको उलटा मुजरिम बना दे।

44. कोई शख्स इबादत से अल्लाह का कुर्ब (निकटता) हासिल नहीं कर सकता जब तक नमाज न पड़े क्योंकि नमाज ही
बन्दे को अल्लाह से मिलाएगी।

46. चार खूबियां नफ्स की जौहर हैं-
1. गरीबी में अमीरी का इज्हार (प्रदर्शन) करना।
2. भूख के वक्त सेरी (तृप्ति) का इज्हार करना।
3. गम के वक्त खुश रहना।
4. दुश्मन के साथ दोस्ती करना।

47. नमाज अल्लाह के कुर्ब (निकटता) का जीना (सीढ़ी) है।

48. झूठी कसम खाने वाले के घर से बरकत जाती रहती है और वह बर्बाद हो जाता है।

49. अलहम्दु शरीफ कसरत (अधिकता) से पढ़ना हाजतों (जरूरतों) को पूरी करने के लिए उत्तम इलाज है।

50. मौत से पहले मौत की तैयारी करो और मौत को हर वक्त सर पर रखो।

51. मौत जिसको दोस्त रखता है उसके सर पर बलाओं की बारिश करता है।

52. कुरआन पाक का देखना सवाब है, पढ़ना सवाब है, अगर एक शब्द पर निगाह पड़े तो दस बदियां (पाप) दूर हो जायें और दस नेकियां लिखी जायें। आंखों की रोशनी बढ़े और उसकी आंख पर कभी कोई मुसीबत न हो।

53. काबातुल्लाह की जियारत से एक हजार साल की इबादत का सवाब मिलता है। हज का सवाब अलग है।

54. आलिम (विद्वान) की जियारत और दुरवेशों की दोस्ती से बरकत हासिल होती है।

55. कमाले ईमान में तीन चीजें हैं-
1. खौफ 2. रजा (उम्मीद) 3. मुहब्बत

56. मां-बाप का मुंह देखना औलाद के लिए इबादत है। जो लड़का मां-बाप की कदम बोसी हासिल करता है उसके पिछले गुनहा माफ कर दिए जाते हैं। ख्वाजा बायजीद बुस्तामी र.अ. ने फरमाया कि मैंने जितने भी मर्तबे पाए अपने मां-बाप से पाये।

57. जिस किसी ने जो कुछ पाया पीर की खिदमत से पाया। बस मुरीद को चाहिए कि थोड़ा भी पीर के फरमान से आगे न बढ़े और पीर जो कुछ उसको तलकीन (शिक्षा) करे उस पर कान धरे और अमल करे।

58. जो शख्स आबेदस्त (पाकी) के बाद वुजू में उंगलियों में खिलाल करता रहे उसकी उंगलियां दोजख की आग से महफूज रहेंगी।

59. वुजू में हर अंग को तीन बार धोना सुन्नत है और उसकी कमी या ज्यादती खलल है।

60. मस्जिद में जाओ तो दायां पैर पहले अन्दर रखो, जब वापस आओ तो बायां पैर पहले निकालो। (सुन्न्त)

61. नापाकी आदमी के बदन में बाल-बाल के नीचे होती है इसलिए गुस्ल (स्नान) के वक्त हर बाल में पानी पहुंचना चाहिए। अगर एक बाल भी सूखा रहे तो पाकी न होगी।

62. आदमी का मुंह पाक होता है चाहे मोमिन हो या काफिर।

63. नमाज एक ओहदा (पद) है अगर इस ओहदे की सलामती के साथ जिम्मेदारी पूरी की तो निजात (मुक्ति) है, वरना खुदा के सामने शर्मिन्दगी की वजह से मुंह सामने न होगा।

64. अरबाब ेसलुकू की सही ताबै ा तीन चीजा ंेस ेपदै ा हाते ी ह-ै पहला-रोजा रखने की नीयत से कम खाना।दूसरा-महबूब के जिक्र की गरज से कम बोलना। तीसरा-इबादत करने की गरज से कम सोना।

65. तसव्वुफ (सूफी मत) में न रस्में हैं कि जिनकी पाबन्दी हो सके और न कुछ इल्म है जिनका पढ़ कर हासिल करना आसान हो बल्कि यह मुहब्बत और तरीकत वालों के नजदीक तसव्वुफ खुदा के बन्दों के साथ खुशी व नर्मी से पेश आना है।

66. आरिफ वही है जिसमें तीन बातें पायी जाएं। पहली- खौफे खुदा, दूसरी-ताजीम (सम्मान), तीसरी-हया (लज्जा)।

67. अगर नमाज के अरकान ठीक तरह से अदा न हुए तो वह पढ़ने वाले के मुंह पर मार दी जाती है। (हदीस)

68. खुदा-ए-तआला ने किसी इबादत के बारे में इतनी ताकीद नहीं फरमाई जितनी नमाज के लिए।

69. जिस कदर दिल लगाकर और सुकून से नमाज अदा करेगा उतना ही खुदा तआला की नजदीकी हासिल होगी।

70. कब्रिस्तान इबरत (नसीहत) की जगह है वहां जाकर हंसना, कहकहा लगाना, खाना-पीना या कोई और दुनियावी काम नहीं करना चाहिये।

71. जो शख्स इबादत नहीं करता वह हराम रोजी खाता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *