तलाशे हक़

शेख़ इब्राहीम क़न्दोज़ी र.अ. ने जब से हज़रत ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती र.अ. को इश्क़े इलाही की झलक दिखाई थी, उसी वक़्त से आपका दिल बेक़रार था। और अब तालीम की हवा ने इश्क़ की आग को भड़का दिया। इस तरह आपने एक दिन समरक़न्द को भी छोड़ा और अल्लाह का नाम लेकर मग़रिब (पश्चिम) की जानिब रवाना हो गये। मग़रिब की सरज़मीन बड़े-बड़े आरिफ़ाने हक़ के मज़ारों से भी पड़ी थी। और बड़े-बड़े ख़ुदा रसीदा बुज़ुर्ग उस सरज़मीन पर मौजूद थे, जहां क़दम-क़दम पर फ़ैज़ के दरिया जारी थे। समरक़न्द से एक रास्ता दक्षिण की तरफ़ बल्ख़ को जाता है। आप इसी रास्ते पर कामिल पीर (योग्य गुरू) की तलाश में चल पड़े मगर इस तमाम सफ़र में कोई पीरे कामिल न मिला और आप बराबर चलते रहे जैसे कोई ग़ैबी कशिश आपको खींचते लिए जा रही हो। नेशापुर से कुछ ही दूर चले थे कि क़स्बा हारून में पहुंच गये।

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